प्रदेश के स्कूलों मेें नैतिक शिक्षा पढ़ाने की राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के पांव जमने से पहले ही उखड़ते नजर आ रहे हैं। इस नए विषय के प्रति बेरुखी का आलम यह है कि बच्चे नैतिक शिक्षा की पुस्तक खरीदने को तैयार नहीं हैं और शिक्षा विभाग हाथ पर हाथ धरे बैठा है। कुल प्रकाशित 11.60 लाख पुस्तकों में से बमुश्किल 50 हजार पुस्तकों की खरीद हुई। यानी, नौंवी से बारहवीं कक्षा के साढ़े 11 लाख बच्चों में से केवल 50 हजार ने नैतिक शिक्षा पढ़ने में रुचि दिखाई।
राज्य के शिक्षा मंत्री रामबिलास शर्मा ने व्यक्तिगत रुचि लेकर इसी शैक्षणिक सत्र से नैतिक शिक्षा विषय को लागू कराया, लेकिन खुद के महकमे की सुस्ती की वजह से नैतिक शिक्षा पढ़ाने के प्रदेश सरकार के प्रयास को पलीता लग सकता है। प्रदेश के बच्चों को दोबारा नैतिक शिक्षा पढ़ाने के लिए सरकार ने जोर-शोर से प्रयास किए। इसी शैक्षणिक सत्र से नौंवी से लेकर 12वीं कक्षा के बच्चों को नैतिक शिक्षा पढ़ाने का निर्णय लिया और लाखों रुपये खर्च करके हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड के माध्यम से लगभग साढ़े 11 लाख पुस्तक प्रकाशित कराई।
शिक्षा बोर्ड के सूत्र बताते हैं कि इस शैक्षणिक सत्र के सात महीनों के दौरान लगभग 50 हजार पुस्तकों की बिक्री हुई है। जबकि, चारों कक्षाओं में छात्रों की तादाद साढ़े 11 लाख है। यानी, प्रदेश के केवल पांच प्रतिशत विद्यार्थियों ने नैतिक शिक्षा में रुचि दिखाई है। पुस्तक की कीमत भी कोई ज्यादा नहीं है। एक पुस्तक की कीमत लगभग 17 रुपये है। सरकार ने हर बच्चे तक पुस्तक पहुंचाने का जिम्मा शिक्षा विभाग को दिया है।
क्यों है इतनी बेरुखी
नैतिक शिक्षा विषय को न पढ़ने के पीछे कई वजह हैं। इस विषय का स्कीम ऑफ स्टडी में शामिल न किया जाना सबसे बड़ी वजह है। इस विषय की न तो परीक्षा होगी और न ही कोई मार्किंग/ग्रेडिंग। इस कारण विद्यार्थी नैतिक शिक्षा के प्रति गंभीर नहीं हैं।
बता दें कि पहले भी एक बार नैतिक शिक्षा विषय लागू हुआ था। तब यह स्कीम ऑफ स्टडी में शामिल था। बाकायदा परीक्षा होती थी, लेकिन अंक नहीं जुड़ते थे। तब यह नियम था कि जो परीक्षार्थी नैतिक शिक्षा में फेल होगा, उसे पास का सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा।
हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ के प्रदेश अध्यक्ष वजीर सिंह का कहना है कि बच्चों ने नैतिक शिक्षा की पुस्तकें नहीं खरीदी, इसका मतलब यह है कि बच्चों ने इस विषय को नकार दिया है। यह भी साबित हो गया कि यह पॉलिटिक्ल एजेंडा है। भाजपा सरकार हिंदू ऑइडियोलॉजी थोपना चाहती है। उन्होंने कहा कि पूरी शिक्षा नैतिकता पर टिकी है, तो इसे अलग से विषय के तौर पर पढ़ाया जाना अतार्किक है।