केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की अमलीजामा पहनाने में अहम प्रक्रिया औसत उत्पादन निर्धारण (क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट) लेटलतीफी की जद में आ गई है। बाजरे की फसल की लगभग 70 प्रतिशत कटाई हो चुकी है, लेकिन अभी तक औसत उत्पादन प्रक्रिया शुरू ही नहीं हो सकी है। पहले सरकार किसी प्राइवेट एजेंसी के माध्यम से औसत उत्पादन निर्धारण का काम कराना चाह रही थी। यह सिरे नहीं चढ़ा तो अब कृषि अधिकारियों को यह काम दिया है।
इस प्रक्रिया में पेच यह है कि जिले में बाजरे की 70 प्रतिशत फसल की कटाई हो चुकी, तो कपास फसल की भी पहली चुनाई हो गई है। जबकि, खरीफ फसलों का बीमा करने के बाद उनके औसत उत्पादन निर्धारण के लिए अभी तक कोई प्रयोग नहीं किया गया। ऐसे में किसानों को फसल बीमा का लाभ किस आधार पर आवंटित किया जाएगा? यह सवालिया घेरे में है।
गौरतलब है कि सरकार की ओर से गांवों में फसलों का औसत उत्पादन निर्धारण करने के लिए किए जाने वाले प्रयोग के लिए पहले निजी कंपनी अथवा गैर सरकारी एजेंसी को ठेका दिया जाना था। इसके लिए बकायदा टेंडर भी आमंत्रित किए गए थे। लेकिन किसी कारण बात सिरे नहीं चढ़ पाई तो अब कृषि विभाग अधिकारियों को ही यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। विभाग के प्रत्येक एडीओ को 6 से 8 गांवों की चारों फसलों (कपास, मक्का, धान व बाजरा) का औसत उत्पादन निर्धारित करना होगा।
और भी हैं कई समस्या
फसल बीमा योजना के अंतर्गत गांव को यूनिट मानकर प्रत्येक फसल का औसत उत्पादन निकालने के लिए पटवारी की सहायता ली जाएगी। किस गांव में किस खेत से औसत उत्पादन निर्धारण किया जाएगा, इसके लिए किला नंबर संबंधी जानकारी पटवारी मुहैया कराएगा। लेकिन एडीओ के 30 से 40 प्रतिशत पद रिक्त हैं। पटवारियों की भी काफी कमी है। इन हालात में यह प्रक्रिया तेजी से पूरी हो पाएगी, इसमें संदेह है।
यह बात सही है कि पहले फसल उत्पादन निर्धारण का काम निजी कंपनी के माध्यम से कराए जाने की योजना थी। अब विभाग के अधिकारी यह काम करेंगे। अगले सप्ताह काम आरंभ हो जाएगा। पहले ब्लॉक को यूनिट माना जाता था, लेकिन अब गांव को यूनिट मानकर फसलों को औसत उत्पादन निर्धारित होगा। इसलिए, इसमें कोई ज्यादा समस्या वाली बात नहीं है।
आत्माराम गोदारा, डिप्टी डायरेक्टर, कृषि विभाग