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कारगिल युद्ध में अदम्य साहस दिखा चुका अशोक भूमाफिया से लड़ रहा हक की जंग

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पुश्तैनी जमीन का हक पाने के लिए अब तक की गई शिकायतों का पुलिंदा दिखाता पूर्व सैनिक अशोक कुमार। सं? - फोटो : Bhiwani
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भिवानी। कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना को नाकों तले चने चबाने पर मजबूर कर देने वाला युद्धवीर अशोक कुमार व्यवस्था के खिलाफ चल रही जंग में खुद को थका हारा महसूस कर रहा है। गांव तिगड़ाना के अशोक कुमार की गुरुग्राम के फरुखनगर के गांव हरिनगर में 26 एकड़ पुश्तैनी जमीन है, जिस पर भूमाफिया का कब्जा छुड़वाने के लिए पिछले 16 साल से अशोक हक की लड़ाई लड़ रहा है।
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18 मार्च 2020 को गुरुग्राम के डीसी ने भी उक्त भूमि को अशोक के पूर्वजों की माना और उसके हक में फैसला भी सुना दिया है। मगर शासन और प्रशासन कब्जाधारियों के चंगुल से भूमि को आजाद नहीं करा पा रहा है। कारगिल युद्ध में दुश्मनों की लगी तीन गोलियों और समीप फटे बम की चपेट में आने से अशोक कुमार 75 फीसदी तक दिव्यांग हो चुका है। मगर व्यवस्था के खिलाफ उसकी जंग अभी भी जारी है।
अशोक कुमार 1999 के कारगिल युद्ध का प्रत्यक्ष गवाह है। इसमें उसने आखिरी निर्णायक लड़ाई लड़ी और दुश्मनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। अशोक कुमार ने बताया कि युद्ध में लगी चोटों की वजह से उसे 11 मार्च 2001 को सात साल छह माह की देश सेवा के बाद सेवानिवृत्त कर दिया था। तभी से लेकर आज तक वह अपनी पुस्तैनी भूमि को पाने के लिए व्यवस्था के खिलाफ हक की लड़ाई लड़ रहा है। अशोक ने बताया कि उनकी पुश्तैनी जमीन आज भी सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें पूर्वजों के नाम है, लेकिन इस भूमि पर भूमाफिया का कब्जा है। उस जमीन पर अब निर्माण भी हो चुका है। उसे हासिल करने के लिए उसने सीएम से पीएम तक शिकायत भेजी, हर जगह से कार्रवाई का आश्वासन भी मिला। मगर उसकी हक की लड़ाई में किसी ने उसका साथ नहीं दिया। देश के प्रति जान को कुर्बान करने का जज्बा रखने वाला अशोक अपने देश में खुद के साथ हो रहे अन्याय से बहुत दुखी है।
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कारगिल युद्ध में दिखाया शौर्य, टाइगर हिल का किया फतह
सेना के 16 ग्रेनेडियर में अशोक कुमार बतौर लांस नायक आठ मई को कारगिल युद्ध में शामिल हुआ था। 26 जुलाई 1999 तक चले इस युद्ध में अशोक ने मौत को नजदीक से देखा, मगर हिम्मत नहीं हारी और दुश्मनों के आगे हथियार नहीं डाले। अशोक ने बताया कि 30 जवानों की टुकड़ी को अंतिम हमले के लिए टाइगर हिल की रोडल रिज पर भेजा। 24 जुलाई को हमला किया और दुश्मनों को पीछे धकेल दिया। अधिकारियों को सूचना भेजी गई की चोटी फतह कर ली है। 25 जुलाई को पाकिस्तानी सेना ने तीन तरफ से उन्हें घेर लिया। मुख्य रास्ता भी पत्थरों से बंद कर दिया, ताकि कोई मदद न पहुंचे। उनके सामने पाकिस्तानी बेस कैंप नजर आ रहा था। इसमें 300 सैनिक हवाई जहाज से उनके सामने उतर गए और मोर्चा संभाल लिया। हमारे छह जवान शहीद हो गए। पाकिस्तानी सेना का गोला बारूद खत्म हुआ तो वे पीछे हटे। मगर दुश्मनों की तरफ से उन पर फायरिंग जारी रही। हमारे पास भी गोला बारूद खत्म हो चुका था। इसी दौरान दुश्मन की एक गोली अशोक की कनपटी के नीचे लगी और दूसरी गोली पेट से गुजर गई। तीसरी गोली से भी वह गंभीर जख्मी हो गए। दुश्मन का एक गोला उसके पास आकर फटा। इससे उसके बांया पैर के चिथड़े उड़ गए और हड्डी नजर आने लगी। दुश्मन उन पर फिर से हावी हो गया। रात भर गोली बारी चलती रही। 26 जुलाई की सुबह उसके पास सिर्फ चार ग्रेनेड बचे थे, जिसमें दो ग्रेनेड उसने दुश्मन पर फेंक दिए। दो ग्रेनेड अपने दोनों हाथों में लेकर खुद को शहीद करते हुए दुश्मनों को हर हाल में मौत देने की ठान ली। मगर बर्फ में उसके हाथ जम चुके थे और पैरों से हिला भी नहीं जा रहा था। उसे 28 जुलाई को श्रीनगर कैंप में होश आया। उसके परिजनों को उसके शहीद होने की खबर मिली थी, इसलिए वे उसका पार्थिव शरीर लेने पहुंचे थे। मगर जिंदगी ने कुछ सांसे बचाकर रखी थी, जिससे वह बच गए। दो साल तक उनका सेना के अस्पतालों में इलाज चला, लेकिन पैरों से नहीं चल पाने की वजह से उन्हें सेवानिवृत्ति दे दी गई।
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