कोरोना महामारी का एक वर्ष पूरा हो गया है। एक साल में 6380 कोरोना पॉजिटिव हुए। जिनमें 6219 ने कोरोना से जिंदगी की जंग जीती तो 145 हार गए। 16 अभी भी कोरोना से जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं। कोरोना का एक साल बहुत कुछ सीखा गया। समाजसेवी लोग मदद के लिए आगे आए तो शिक्षा, रोजगार के कारण परिवार से दूर रहने वाले भी नजदीक आए। बच्चों ने ऑनलाइन पढ़ाई का ऑप्शन चुन एक नई तकनीक शुरू की। कोरोना महामारी ने लोगों के जीने का ढंग ही बदल दिया है। मास्क लोगों के लिए अनिवार्य हो गया तो लोग अब फास्ट फूड की बजाए देसी खाने खासकर फलों को प्राथमिकता देने लगे ताकि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़े। बाजारों में काफी बदलाव देखा जा रहा है। पहले काफी दुकानदार ग्राहकों को दुकान में भी बैठाते मगर अब अधिकतर ने दुकानदार के अंदर प्रवेश तक पर रोक लगा दी है। एक तरफ जनवरी माह के अंत में भिवानी कोरोना मुक्त होने की तैयारी चल रही थी वहीं अब हर रोज केस सामने आ रहे है। ऐसे में बाजारों में उमड़ने वाली भीड़ की लापरवाही महंगी साबित हो सकती है। 60 से70 फीसदी लोग न मास्क लगा रहे है और न ही सामुदायिक दूरी का पालन कर रहे है।
चार माह में दम तोड़ गए 128 कोरोना पॉजिटिव
सितंबर, अक्तूबर, नवंबर और दिसंबर माह काफी घातक रहे। अकेले नवंबर माह में 1811 कोरोना पॉजिटिव सामने आए और 58 लोगों ने अपनी जान भी गंवाई। मगर इस माह में 1748 ठीक भी हुए। सितंबर, अक्तूबर और नवंबर माह ऐसे रहे, जिनमें एक हजार से अधिक कोरोना पॉजिटिव आए। तीन माह में 4227 कोरोना पॉजिटिव सामने आए और 102 लोगों ने अपनी जान गंवाई। इस दौरान 4079 ठीक भी हुए। सितंबर से दिसंबर तक के चार माह में कोरोना से 128 लोगों की मौत हुई।
हारना तो हमने सीखा ही नहीं : परिजनों ने बढ़ाया हौसला तो जीती कोरोना से जंग
28 अगस्त को मुझे कोरोना हुआ। बुखार से हालत खराब थी। कोरोना महामारी का डर ज्यादा था। घर के एक कमरे में रह रही थी। करीब 25 दिन उस कमरे में बीताए। मेरे अलावा मेरे पति सुरेश कुमार गिल को भी कोरोना हो गया। वे अलग कमरे में थे। बीमारी के कारण उठा तक नहीं जा रहा था। सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। एक रात तो इतनी घबराहट हुई कि सोचने लगी कि क्या होगा। एंबुलेंस के लिए स्वास्थ्य विभाग में फोन किया मगर नहीं आई। पति और बच्चों ने ही देखभाल की। बच्चों ने काफी हौसला बढ़ाया। ध्यान भी पूरा रखा। थोड़ी थोड़ी देर में खाने के लिए फल, काढ़ा, नारियल पानी आदि ला रहे थे। उनकी देखभाल और हौसला बढ़ाने के कारण ही मैं रिकवरी कर पाई। मेरा पोता व पोती से मिलने का काफी मन होता था। दोनों बच्चे काफी छोटे है और रोशनदान से ही मुझे देखते और बात करते थे। मैं कमरे में बंद सिर्फ भगवान को ही याद करती थी। योगा करने की सोची मगर सांस लेने में तकलीफ के कारण नहीं कर पाई। धीरे धीरे थोड़ा सुधार हुआ तो योग शुरू किया। उसके बाद बेटी ज्योति जो कि बहादुरगढ़ में शादीशुदा है उसे कोरोना हो गया और उसकी हालत भी गंभीर हो गई। उसकी चिंता के कारण भी परेशानी हुई मगर परिजनों के सहयोग से वह कोरोना को हराकर नई जिंदगी पा पाई। मुझे थाइराइड और अल्सर की समस्या है, इस कारण ज्यादा हालत खराब हुई। बेशक कोरोना ठीक हो गया हो मगर आज भी शरीर पर इसका असर है। मन में घबराहट होती है वहीं थकान की भी समस्या रहती है। याददाश्त भी काफी कमजोर हो गई है। -किरण गिल, प्रिंसिपल, राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय
तनाव में सो नहीं पाई, 11 साल के बेटे ने पति के साथ मिलकर रखा ध्यान
मुझे कोरोना की शुरूआत दौर में ही जुलाई माह में कोरोना हुआ। आइसोलेट किया गया। जिस कारण काफी तनाव में आ गई थी। चूंकि खुद चिकित्सक हूं और इसी तनाव में ठीक होने के लिए ज्यादा दवाइयां ले ली। जिससे शूगर बढ़ने लगा। तनाव में छह-सात रात सो नहीं पाई। बच्चे छोटे है और उनसे अलग रहना पड़ा। बच्चों के खाने पीने की व्यवस्था बिगड़ गई। पति राज कुमार ने काफी ख्याल रखा। मेरा बेटा शिवम 11 साल का है। उसने मेरा काफी ध्यान रखा। हर आधे घंटे में मुझे सूप बनाकर देता, नारियल पानी, फल देता। आज सोचती हूं कि 11 साल का बच्चा कूकर में मुझे सूप बनाकर दे तो हैरानी सी होती है मगर मेरे बेटे ने मेरी लिए सब किया। अकेले कमरे में बिताए 10 दिन काफी परेशानी भरे रहे। उस समय प्रेरणादायी किताबें पढ़ने पर ध्यान लगाया। दूध व दूध से बने सामान को खाना बंद कर दिया। काफी कमजोरी भी आई। कोरोना ने बहुत कुछ सीखाया। अब भी सामान्य अस्पताल में मरीजों के बीच रहती हूं। थोड़ा डर भी रहता है मगर दूसरों का इलाज करना भी जरूरी है। -डॉ. सुनीता संागवान, महिला रोग विशेषज्ञ, सामान्य अस्पताल।