फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

महिलाएं एक-दूसरे में घरों में बनवाती थीं पकवान

विज्ञापन
विज्ञापन
होली पर्व की दस्तक पहले एक माह पहले ही देखने को मिल जाती थी। बाजारों में रंगों की महक और घरों में मिठाईयां बननी शुरू हो जाती थी। एक-दूसरे के घरों में जाकर महिलाएं मिठाईयां तैयार करवाती थी। समय-समय के साथ पर्व भी बदलता जा रहा है। यह विचार शनिवार अमर उजाला से जुड़े बुजुर्गों ने रखे। उन्होंने कहा कि अबकि होली और म्हारे जमाने की होली में वो बात कहां है। मोहल्ले के लोगों में वो भाईचारा कहां जो
विज्ञापन

अजीत नगर निवासी 74 वर्षीय अमरनाथ आहुजा ने बताया कि पहले होली के रंगों की महक 4-5 दिन रहती थी। कभी रिश्तेदार आ रहे हैं तो कभी यार दोस्त। आपसी भाईचारा बहुत होती था। आज के समय में होली पर्व के मायने की बदल गए है। एक दिन पहले व बाद पता नहीं चलता कि होली पर्व था कि नहीं। सभी अपने कामों में व्यस्त होकर रह गए है।
अंबाला कैंट निवासी 75 वर्षीय विपिन कपूर ने बताया कि उनके समय में होली पर्व भाईचारे को ओर मजबूत करता था। कोई भी किसी को गुलाल लगाता था तो कोई बुरा नहीं मानता था। खुशी से एक-दूसरे के संग होली का पर्व मनाते थे। अब तो किसी की मर्जी के बिना गुलाल लगा दें तो बुरा मान जाता है। यहां तक कि लड़ाई झगड़े हो जाते हैं। सबकुछ बदलता जा रहा है।
विज्ञापन

ग्वालमंडी निवासी बंसी लाल ने कहा कि होली पर्व के मायने की बदल गए है। त्योहार की आड़ में लोग आपसी रंजिश मिटाते हुए दिखाई देते हैं। पुराने समय में तो होली पर्व के आने से एक सप्ताह पहले ही तैयारियां शुरू हो जाती थी। अब तो पता नहीं चलता कि होली चल रही है कि नहीं। महज दो घंटे की होली रह गई। इसलिए अब होली खेलना ही छोड़ दिया।
ग्वालमंडी निवासी 65 वर्षीय गुलशन कुमार ने बताया कि होली पर्व के आते ही अब तो हुडदंग व लड़ाई-झगड़े का ही डर सताने लग जाता है। दूसरे त्योहारों की तरह यह पर्व भी सिमट कर रह गया है। पहले पूरा मोहल्ला एकजुट होकर पर्व मनाता था। रिश्तों को समझा जाता था, लेकिन अब वो बात कहां रह गई।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें