अपने लिए जीना ही जिंदगी नहीं, दूसरों के लिए जीने में जो मजा है वह सहज ही समझ नहीं आ सकता। हमारी तरह ही पशु-पक्षियों में भी जान है और उन्हें भी घायल होने पर मनुष्य की तरह ही दर्द होता है। इन बेजुबानों की मदद के लिए जल्दी से कोई कदम नहीं बढ़ाता, लेकिन वंदे मातरम दल ने यह बीड़ा उठाया है। बेजुबान जानों के लिए दल द्वारा किया जाने वाला कार्य अंबाला के लिए मिसाल बन चुका है। पिछले 10 सालों में दल के सदस्य लगभग 12 हजार से अधिक पशु-पक्षियों की मदद कर चुके हैं।
वंदेमातरम दल के भरत ने बताया कि 12 साल पहले उन्होंने एक गोवंश को घायल अवस्था में देखा था, उस समय उन्होंने स्वयं और डॉक्टर की मदद से गोवंश का इलाज किया था, जब तीन दिन की देखभाल के बाद गोवंश दोबारा चलने लगा तो उन्हें आगे भी ऐसे ही कार्य करने की प्रेरणा मिली। इसके बाद उन्होंने अपने साथियों के साथ पशु-पक्षियों की मदद करनी शुरू की और फिर 2014 में वंदेमातरम दल के नाम से संस्था का पंजीकरण करवाया। उन्होंने बताया कि किसी भी इमरजेंसी की स्थिति में पशु और पक्षियों की सेवा करते हुए उनका इलाज करवाते हैं। यह कार्य उनकी संस्थान अपने स्तर पर ही कर रही है।
वंदे मातरम दल से भरत ने बताया कि उन्हें सूचना मिली थी कि रेलवे स्टेशन के पास एक बाज घायल अवस्था में पड़ा हैं। इसके बाद टीम ने बाज को वहां से रेस्क्यू किया और मरहम पट्टी करवाई। डॉक्टर ने बताया कि उसका एक पंख टूट गया था, इसीलिए उसका ऑपरेशन करना पड़ेगा। टीम ने लुधियाना से बाज के उपचार के लिए सामान खरीदा और फिर उसके पंख में ऑपरेशन के माध्यम से रॉड डलवाई। इस दौरान टीम ने पूरे 60 दिनों तक बाज की सेवा की और इसी दौरान ही उन्होंने उस बाज का नाम भी गुरबाज रखा। 60 दिनों बाद जब बाज पूरी तरह से स्वस्थ हो गया तो उसे छोड़ दिया गया। ऐसे ही वह गोवंश के साथ हिरण व अन्य कई पशुओं की मदद कर चुके हैं।