लड्डू गोपाल के साथ संगीता तंवर।
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मेरी माता ने 15 साल से घर में लड्डू गोपाल रखे हैं। उन्हें देखकर मेरे मन में भी लड्डू गोपाल की सेवा करने का भाव जागा। किसी कारण से सेवा नहीं कर पाई। सात साल पहले भाभी ने मुझे उपहार में लड्डू गोपाल दिए। इसके बाद मैंने लड्डू गोपाल की सेवा करनी शुरू कर दी। वह लड्डू गोपाल बहुत छोटे थे। शृंगार करते समय वे कपड़ों में ढक जाते थे और नजर नहीं आते थे।
एक साल बाद मैं मार्केट से लड्डू गोपाल ले आई। अभी पिछले साल ही मेरी सास कौशल्या देवी वृंदावन गईं। उन्होंने वृंदावन से लड्डू गोपाल लिए। उन्होंने वृंदावन में ही उनका नामकरण कराते हुए माधव नाम रख दिया। अब हमारे घर में तीन लड्डू गोपाल हैं। पिछले साल मैंने माधव के नाम से बूटीक खोला। जो लड्डू गोपाल की कृपा से अच्छा चल रहा है। हमने अपने घर में 25 बाई 30 इंच का बेड बनाया है। इस पर तीनों लड्डू गोपाल विराजमान हैं। मैं लड्डू गोपाल को राधे-राधे के नाम से उठाती हूं। इसके बाद उन्हें स्नान कराते हैं।
अपने हाथ से बनाए वस्त्र से शृंगार करती हूं। सुबह के समय तुलसी वाले मीठे दूध से लड्डू गोपाल को भोग लगाते हैं। आलू वाला पराठा, मलाई और दही से नाश्ता कराते हैं। दोपहर को दूध का भोग, शाम को चाय रस का भोग और रात को फल और दूध का भोग लगाते हैं। इसके अलावा हर जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल का जन्मदिन मनाते हैं। मेरे दो बेटे तुषार, अंशु, सास कौशल्या देवी, पति रमेश और मैं मिलकर उनकी सेवा करते हैं।
प्रस्तुति- संगीता तंवर, लाल कुर्ती बाजार, अंबाला छावनी।