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Ambala News: रेल दुर्घटनाओं का बढ़ रहा आंकड़ा, पिछले वर्ष 150 तो इस वर्ष मिले 189 शव

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अंबाला छावनी जीआरपी थाने के अंदर शवों को रखने के लिए बनाया गया कमरा। संवाद - फोटो : शहर ​स्थित सीटी फाॅरेस्ट का मुख्य गेट। संवाद
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अंबाला। रेल दुर्घटनाओं का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। पिछले वर्ष रेल दुर्घटनाओं सहित प्राकृतिक मृत्यु के लगभग 150 मामले सामने आए थे जो वर्ष 2024 में बढ़कर 189 तक पहुंच गए हैं। वहीं शवों की शिनाख्त न होने के कारण जीआरपी को उनका संस्कार लावारिस के तौर पर करवाना पड़ रहा है।
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मृतकों की पहचान के लिए जीआरपी ने संबंधित दस्तावेज व फोटो संभाल कर रखी हुई है ताकि अगर कभी मृतक के परिजन आएं तो उन्हें हादसे से संबंधित पूरी जानकारी उपलब्ध करवाई जा सके।
प्राप्त आंकड़ों के आधार पर 2024 में रेल दुर्घटनाओं के दौरान 98 मौतें हुई थीं। इनमें 91 पुरुष और सात महिलाएं शामिल थीं। वहीं प्राकृतिक मृत्यु से जुड़े 91 मामले सामने आए थे। इनमें 86 पुरुषों और 5 महिलाओं के शव जीआरपी ने बरामद किए थे।
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14 से लेकर 60 वर्ष के बुजुर्ग के मिले शव
रेल दुर्घटना में मिले शवों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। इसमें 14 से 18 वर्ष के बच्चे और 60 वर्ष के बुजुर्ग शामिल हैं। आंकड़ों के आधार पर 14 से 18 वर्ष की मृतकों की श्रेणी में दो बच्चे शामिल हैं। इसी प्रकार 18 से 30 वर्ष की श्रेणी में 30, 30 से 45 वर्ष की श्रेणी में 27, 45 से 60 वर्ष की श्रेणी में 14 और 60 वर्ष से अधिक उम्र के शव जीआरपी बरामद कर चुकी है।
कम की ही हो पाती है शिनाख्त
रेल दुर्घटनाओं और प्राकृतिक मृत्यु के मामलों में आधे लोगों की ही शिनाख्त हो पाती है। ऐसे में मृतकों के परिजन न मिलने के कारण जीआरपी की भी दिक्कत बढ़ जाती है। शव मिलते ही जीआरपी पहले मौके की फोटो खींचती है। इसके बाद मृतक के पास मिले दस्तावेजों को जुटाया जाता है। वहीं शिनाख्त के लिए मृतक के फिंगर प्रिंट भी लिए जाते हैं जोकि मधुबन लैब में भेजे जाते हैं। लेकिन ऐसे मामलों में भी मृतकों की पहचान करना मुश्किल हो जाती है।
पांच हजार रुपये मिलते हैं एक शव के
रेल हादसा हो या फिर प्राकृतिक मृत्यु का मामला, रेलवे प्रत्येक शव के पांच हजार रुपये जीआरपी को देती है ताकि मृतक से संबंधित सभी दस्तावेज तैयार हो सकें और शव के लिए कफन व अन्य सामान उपलब्ध करवाया जा सके। लावारिस शव की शिनाख्त के लिए जीआरपी तीन दिन तक इंतजार करती है। जब कोई परिजन नहीं आता तो फिर हेल्पिंग सोसायटी शाहबाद से संपर्क किया जाता है जोकि निशुल्क शव का हिंदू रीति रिवाजों के अनुसार संस्कार करती है।
15 साल पहले लगते थे शिविर
रेलवे की पूर्व पुलिस अधीक्षक भारती अरोड़ा के निर्देश पर शिविर लगाने की प्रथा आरंभ की गई थी ताकि रेल हादसों में जान गंवाने वाले और प्राकृतिक मृत्यु प्राप्त करने वाले शवों की पहचान हो सके। लेकिन इन शिविरों में भी जीआरपी को ज्यादा कामयाबी नहीं मिल पाई। 100 में से मात्र दो या तीन मृतकों की पहचान हो पाई। इसलिए मृतकों की पहचान के लिए लगाए जाने वाले शिविरों को बंद कर दिया गया।
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