- 700 करोड़ रुपये बनकर हुआ तैयार, वीआर तकनीक कराएगी भूतकाल की सैर
माई सिटी रिपोर्टर
अंबाला। छावनी में करीब 700 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित शहीद स्मारक अब उद्घाटन के लिए तैयार है। यह स्मारक 1857 की क्रांति के अनसुने नायकों को समर्पित है। इतिहासकारों के अनुसार, 1857 का स्वतंत्रता संग्राम मेरठ से कुछ घंटे पहले 9 मई 1857 को अंबाला में शुरू हुआ था। यह स्मारक इसी महत्वपूर्ण तथ्य को उजागर करता है और देश की आजादी की लड़ाई की कहानियों को जीवंत करेगा। वहीं वर्चुअल रिअल्टी (वीआर) तकनीकि लोगों को आजादी के समय में ले जाएगी।
20 एकड़ में बने इस स्मारक में भूतल, प्रथम तल और द्वितीय तल पर 22 गैलरियां हैं। इनमें अंग्रेजों के आगमन, क्रांति के कारण, अंबाला की घटनाओं और हरियाणा के प्रतिरोध को दर्शाया गया है। आगंतुक यहां भारत को सोने की चिड़िया कहे जाने से लेकर यूरोपीय लोगों के आगमन तक का इतिहास देख सकते हैं। प्राचीन सभ्यता, धर्म और कुरुक्षेत्र के महत्व को भी प्रदर्शित किया गया है। स्मारक में 200 वर्ष पुराना बूढ़ा बरगद वृक्ष भी है। इसकी छत्रछाया में क्रांतिकारियों ने 1857 के संग्राम की योजना बनाई थी। इस स्मारक की परिकल्पना करने वाले कैबिनेट मंत्री अनिल विज का उद्देश्य था कि देश के गौरवशाली इतिहास और बलिदान को देश ही नहीं बल्कि विश्व को दिखाया जाए।
अत्याधुनिक प्रदर्शन और अनुभव
शहीद स्मारक में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का व्यापक प्रयोग किया गया है। म्यूजियम की दीवारें अंकीय पर्दों से लैस हैं, जो आगंतुकों को विस्तृत जानकारी प्रदान करती हैं। आभासी वास्तविकता प्रौद्योगिकी के माध्यम से 1857 की क्रांति और किसानों के शोषण को अनुभव किया जा सकता है। यहां त्रि-आयामी यानि 3-डी प्रदर्शन और अंतरराष्ट्रीय स्तर की ध्वनि प्रणाली भी हैं, जो दर्शकों को उस कालखंड में ले जाती हैं। इंटरैक्टिव गैलरी में आगंतुक स्वयं क्रांति का हिस्सा बनने का अनुभव कर सकते हैं।
क्रांति की योजना और अंबाला की भूमिका
स्मारक में क्रांति की योजना को दर्शाने वाली गैलरी है, जिसमें बांस की लकड़ियों से बनी संरचनाएं हैं। अंबाला के 1857 के मानचित्र और उस समय की घटनाओं को विस्तार से प्रदर्शित किया गया है। 9 मई 1857 को अंबाला में क्रांति की शुरुआत के दृश्य भी दिखाए गए हैं। एक टेलीग्राफ मेज भी है, जिसके जरिए आगंतुक संदेश भेजने का अनुभव ले सकते हैं। स्मारक में देश के विभिन्न क्रांति स्थलों से लाई गई मिट्टी भी रखी गई है, जो वीर सपूतों के बलिदान का प्रतीक है।
स्वतंत्रता संग्राम के अनसुने नायक
यह स्मारक उन अनसुने नायकों को श्रद्धांजलि देता है, जिनके नाम एक दीवार पर दर्ज हैं। यहां अंग्रेजों द्वारा भारतीय संस्कृति के केंद्रों और गुरुकुलों के दमन को भी दर्शाया गया है। नील और अफीम के किसानों की पीड़ा को आभासी वास्तविकता प्रौद्योगिकी के जरिए दिखाया गया है। स्मारक में बलिदान और स्वतंत्रता के लिए अपनाए गए विभिन्न तरीकों को भी प्रदर्शित किया गया है, जो दर्शकों को देश के गौरवशाली इतिहास से जोड़ता है।
1857 की क्रांति के गुमनाम हीरोज के दीवार पर लिखे नाम। संवाद- फोटो : 1
1857 की क्रांति के गुमनाम हीरोज के दीवार पर लिखे नाम। संवाद- फोटो : 1
1857 की क्रांति के गुमनाम हीरोज के दीवार पर लिखे नाम। संवाद- फोटो : 1
1857 की क्रांति के गुमनाम हीरोज के दीवार पर लिखे नाम। संवाद- फोटो : 1
1857 की क्रांति के गुमनाम हीरोज के दीवार पर लिखे नाम। संवाद- फोटो : 1
1857 की क्रांति के गुमनाम हीरोज के दीवार पर लिखे नाम। संवाद- फोटो : 1
1857 की क्रांति के गुमनाम हीरोज के दीवार पर लिखे नाम। संवाद- फोटो : 1