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कारगिल दिवस पर विशेष : शादी से 24 दिन पहले ही देश के लिए शहीद हो गया भारत मां का वीर सपूत

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The brave son of Mother India was martyred for the country 24 days before the wedding. - फोटो : Ambala
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(अंबाला) नारायणगढ़। देश की सेवा का जज्बा और भारत मां की सेवा करने का जज्बा उसमें कूट-कूटकर भरा हुआ था। उसने न केवल दुश्मनों के छक्के छुड़ाए बल्कि अपने साहस का परिचय देते हुए उनको दुम दुबाकर भागने को मजबूर कर दिया। हम बात कर रहे हैं देश की सेवा के लिए शहीद होने वाले वीर सिपाही पवन कुमार की। जिन्होंने शादी के 24 दिन पहले ही देश की सेवा की खातिर दुश्मनों से लोहा लेते हुए कारगिल युद्ध में अपनी जान दे दी।
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कारगिल के युद्ध में अपने शौर्य का परिचय देते हुए 12 जाट रेजीमेंट के वीर सिपाही पवन कुमार महज 27 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गए। 31 अगस्त 1999 को दोपहर के करीब 12 बजे पवन दुश्मनों के छक्के छुड़ा रहा था। अचानक एक बम आया और पवन कुमार की फौलादी छाती को चीरता हुआ निकल गया। परिजनों ने बताया कि उस समय शाम को रेडियो पर खबरें आती थी। पवन के बारे में परिजनों को पटवारी संत राम ने अगले दिन एक सितंबर को सुबह 9 बजे यह सूचना दी।
उम्र में सबसे छोटे होने के चलते सभी के थे लाड़ले
देश का नाम रोशन करने वाले शहीद पवन कुमार सैनी खंड नारायणगढ़ के गांव गदौली में एक गरीब किसान के घर 2 फरवरी 1972 को जन्मा था। शहीद पवन के मन में देश सेवा का जज्बा बचपन से ही भरा हुआ था। अपने जज्बे को पूरा करने के लिए उन्होंने वर्ष 1991 में भारतीय सेना में ज्वाइन कर लिया था। शहीद पवन कुमार सैनी जो 31 अगस्त 1999 को कारगिल की अनीता टॉप पोस्ट में अपने अन्य जवान साथियों के साथ ड्यूटी कर रहे थे। शहीद पवन कुमार सैनी कारगिल में शहीद होने वाले जिला अंबाला के सबसे पहले सैनिक थे। गांव गदौली में किसान ईश्वर राम व माता सरदारी देवी के घर जन्मा पवन कुमार परिवार में सबसे छोटा होने के नाते सबका लाडला था। शहीद पवन कुमार के भाई ने बताया कि बड़े भाई रामजी लाल ने पिता के साथ खेतों में मेहनत कर हम लोगों को पढ़ा लिखाकर इस काबिल बनाया। शहीद पवन कुमार यमुनानगर से डीजल मैकेनिक में आईटीआई करने के बाद सन 1990 में आर्मी में भर्ती हो हुए थे।
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24 सितंबर 1999 को होनी थी थी शादी
जून 1998 में छुट्टी पर आए पवन की सगाई नारायणगढ़ के ही गांव गढ़ी में हुई। जिसके बाद शादी की तारीख 24 सितंबर 1999 तय की गई। जब ऑपरेशन विजय शुरू हुआ उस समय पवन की तैनाती सियाचिन में थी। वहां शहीद पवन की तीन महीने की तैनाती समाप्त होने में केवल दो दिन शेष थे। इसके बाद छुट्टी मंजूर की गई थी। क्योंकि 24 सितंबर 1999 शहीद पवन की शादी की तारीख निर्धारित की गई थी। परंतु इससे पहले 31 अगस्त 1999 को पवन ने देश के लिए मात्र 27 वर्ष की उम्र में अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
विद्यालय का नाम भी उनके नाम पर रखा
परिवार में वर्तमान में उनका छोटा भाई कृष्ण, मां सरदारी देवी, भतीजा जसविन्द्र सिंह व सौरव और दोनों भाभियां हैं। बेटे की यादों को संजोए रखते हुए मां ने आज भी बेटे के कमरे को सजाकर रखा हुआ है। शहीद पवन कुमार के भाई कृष्ण तथा भतीजे जसविंद्र ने बताया कि गांव वासी व क्षेत्र के लोग प्रतिवर्ष 3 सितंबर को शहीद पवन कुमार की बरसी मनाते हैं। गांव बरसुमाजरा में स्थित पेट्रोल पंप परिसर में उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें याद करते हैं। बरसुमाजरा में पेट्रोल पंप के अलावा गांव गदौली में विद्यालय का नाम और विद्यालय तक जाने वाली सड़क का नाम भी उनके भाई पवन कुमार के नाम पर रखा हुआ है।
कहता था एक दिन करूंगा ऐसा काम रोशन होगा तुम्हारा नाम कहते हुए बिलख पड़े मां-बाप
संवाद न्यूज एजेंसी
बराड़ा। कांसापुर के जांबाज मनजीत सिंह कारगिल में दुश्मन के जमकर परखच्चे उड़ाए। इसी दौरान उनकी छाती में गोली लगने से वह भी देश के लिए मर मिटे। कांसापुर के शहीद मंजीत सिंह की माता सुरजीत कौर ने कहा बताया कि उसे अपने बेटे मंजीत सिंह की शहादत पर नाज है।
शहीद मंजीत सिंह 8 सिख रेजीमेंट में तैनात था। मां ने बताया कि अब शहीद मंजीत सिंह के भतीजों को पढ़ाया लिखाया जा रहा है। अगर उनको फौज में जाने का मौका मिला तो वह गुरेज नहीं करेंगी। बल्कि फर्क से अपने पौतों को सेना में भेजेगी। वह उनको उनके चाचा की शहादत के बारे में बताती रहती हैं। किस तरह उनके चाचा मंजीत सिंह दुश्मनों को धराशायी कर वीर गति पाई। शहीद मंजीत सिंह के पिता सरदार गुरचरण सिंह ने बताया कि उनका बेटा बचपन से ही होनहार रहा है। वह जब पढ़ा करता था तो कहा करता था कि एक दिन वह ऐसा काम करेगा कि उसके माता-पिता का नाम रोशन होगा ओर दुनिया मुझे ताउम्र याद करेगी। मेरा बेटे ने देश की सेवा करने के लिए सेना में ज्वाइनिंग की। कारगिल के युद्ध में दुश्मनों के परखच्चे उड़ाते हुए देश के लिए शहीद हो गया। यह बताते हुए शहीद के माता-पिता की आंखें नम हो गई। सरकार ने बराड़ा में शहीद मंजीत सिंह के नाम से गैस एजेंसी दी। शहीद मंजीत सिंह के दो भाई थे जिसमें बड़ा भाई हरजीत सिंह पिछले तीन साल पहले सड़क हादसे में जान गवा बैठा था। उसकी मौत के बाद हरजीत सिंह की जगह उसके पिता गुरचरण सिंह एजेंसी का काम काज देखते हैं। शहीद मंजीत सिंह का दूसरा भाई दलबीर सिंह मुस्तफाबाद में व्यापार करता है। कभी-कभी वह भी गैस एजेंसी के काम काज में अपने माता पिता का का सहयोग देता
7 साल पहले बंद हुआ स्कूल
कांसापुर के शहीद सिपाही मंजीत सिंह की माता सुरजीत कौर कहती हैं कि आज उनका बेटा होता तो क्या बात होती। उन्हें फर्क है कि उनके बेटे ने देश के लिए सर्वोच्च सेवा दी। मंजीत सिंह 7 जून 1999 में कारगिल में आपरेशन विजय में दुश्मनों को धराशायी करते हुए छाती पर गोली लगने से शहीद हुए थे। गांव में बच्चों के शिक्षा ग्रहण करने के लिए शहीद के नाम से खोला गया सरकारी स्कूल अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। परिजनों ने लंबे समय मांग उठाई कि इस स्कूल को पुन: खोला जाए या फिर शहीद के नाम से कोई अन्य संस्था यहां खोली जाए। लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ। कम बच्चों का हवाला देते हुए करीब 7 वर्ष पूर्व सरकार ने इस स्कूल में ताला जड़ दिया था। अब गांव के बच्चों को दूसरे गांव धीन के सरकारी स्कूल में जाकर पढ़ना पड़ रहा है।
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