अंबाला। 181 वर्ष पुराना प्राचीन हाथी खाना कैलाश मंदिर भक्तों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। सावन व शिवरात्रि पर भक्तों का हुजूम उमड़ पड़ता है। अंबाला व आसपास के शहरों से भी भक्त यहां माथा टेकने के लिए पहुंचते हैं। सावन के पहले सोमवार को लेकर मंदिर में तैयारियों की गई है। भक्त कतारों में लगकर नतमस्तक होकर आर्शीवाद लेंगे। अलसुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी- लंबी कतारें लगी रहती हैं।
प्राचीन हाथी खाना कैलाश मंदिर के महंत श्रीश्री 108 मन मोहन दास ने बताया कि सुबह चार बजे मंदिर के कपाट खुलेंगे। मंदिर खुलते ही श्रद्धालु बेल पत्र, फल, फूल और शहद से बाबा का अभिषेक करेंगे। इसके बाद सुबह पांच बजे मंदिर में भोले बाबा की आरती की जाएगी। इसके बाद मंदिर परिसर में चाट, टिक्की,खीर और मालपुडे़ का प्रसाद वितरित किया जाएगा। शाम को मंदिर में कीर्तन किए जाएंगे। रात आठ बजे बाबा की आरती की जाएगी।
मंदिर होता था साधु संतों का डेरा
हाथी खाना कैलाश मंदिर में अंग्रेज के काल में फौज के हाथी बाधे जाते थे। उस समय यहां साधु संतों का डेरा होता था। जिस कारण मंदिर के नाम के साथ ''''हाथीखाना'''' जुड़ा है। संतों की इच्छा के बाद यहां पर मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। मंदिर के संस्थापक श्री श्री 1008 महंत श्री जय राम दास जी महाराज लायलपुर वाले थे। आगे उनके गद्दीनशीन शिष्य ही मंदिर की देखरेख करते आए हैं। वर्तमान में श्री श्री 108 महंत श्री मनमोहन दास जी महाराज गद्दी नशीन हैं। मंदिर में 40 फीट ऊंची अर्ध नारीश्वर की मूर्ति आकर्षण का केंद्र है।
यह हैं मंदिर के महंत
प्राचीन हाथी खाना कैलाश मंदिर के श्रीश्री 108 महंत मन मोहन दास ने बताया कि श्रीश्री 1008 महंत जयराम दास ने सन 1844 में हाथी खाना कैलाश मंदिर को स्थापित किया था। इसके बाद श्रीश्री 108 महंत राम सेवक दास, श्रीश्री 108 महंत केशवदास, श्रीश्री 108 महंत रामचरण दास, श्रीश्री 108 महंत काशीराम दास ने मंदिर की सेवा की। वर्तमान में श्रीश्री 108 महंत मन मोहन दास महाराज मंदिर की सेवा कर रहे हैं। इनके साथ ही उत्तराधिकारी महंत माधोदास भी सेवा कर रहे हैं।
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