अंबाला। तोपखाना परेड में जमीन पर कब्जा लेने गई कैंटोनमेंट बोर्ड की टीम पर स्थानीय लोगों ने हमला कर दिया। इस दौरान कुछ शरारती तत्वों ने जेसीबी चालक समेत बोर्ड के अन्य कर्मचारियों पर पथराव कर दिया। गनीमत रही कि किसी भी कर्मचारी को चोट नहीं लगी। इस दौरान टीम के साथ मौके पर गई पुलिस ने स्थिति को संभाला और पत्थर फेंकने वालों को खदेड़ दिया। इस दौरान पुलिस को हलके बल का भी प्रयोग करना पड़ा। इस दौरान जब पुलिस ने पत्थर फेंक रहे कुछ युवकों को पकड़ लिया तो उनके परिजनों ने पुलिस से माफी मांगकर उन्हें छुड़ा लिया। करीब पांच घंटे तक चली कैंटोनमेंट बोर्ड की कार्रवाई का स्थानीय लोगों ने जमकर विरोध किया और रोष भी जताया।
जानकारी के अनुसार कैंटोनमेंट बोर्ड की लगभग 21 एकड़ जमीन को तोपखाना परेड में रहने वाले लोगों को लीज पर दिया गया था। लीज खत्म हो गई लेकिन लोगों ने जमीन पर कब्जा नहीं छोड़ा। इसके बाद मामला कोर्ट में गया और कोर्ट ने फैसला कैंटोनमेंट बोर्ड के हक में सुनाय दिया। इसके बाद स्थानीय निवासियों को जगह खाली करने के लिए दो साल तक लगातार नोटिस दिए गए लेकिन उन्होंने जगह खाली नहीं की। इस संबंध में स्थानीय लोगों को 18 जून को जमीन खाली करने के लिए अंतिम नोटिस दिया गया। इसके बाद भी न तो लोगों ने फसल काटी और न ही सामान हटाया।
जमीन का 90 लाख रुपये हुआ किराया
कैंटोनमेंट बोर्ड के अधिकारी ने बताया कि 21 एकड़ जमीन को 22 लोगों को किराये पर दिया गया था। इन लोगों ने 2014 के बाद से कैंटोनमेंट बोर्ड को किराया देना बंद कर दिया था। इसके लिए उन्हें कई नोटिस दिए गए। इसके बाद भी उन्होंने न तो लंबित किराया जमा करवाया और न ही बोर्ड आकर कोई जानकारी दी। मौजूदा समय में यह किराया 90 लाख रुपये तक पहुंच चुका है।
लोगों ने लगाया आरोप
तोपखाना परेड के लोगों ने इस कार्रवाई को धक्काशाही बताया है। उनका कहना है कि सब्जी बेचकर ही वो बरसों से अपने परिवारों का भरण-पोषण कर रहे हैं। कब्जे की कार्रवाई के दौरान मेहनत-मजदूरी से उगाई गई उनकी सब्जी की फसल को जेसीबी की मदद से रौंद दिया गया। अब उनकी तीसरी पीढ़ी काम संभाल रही थी। ऐसे में अब उनके लिए काम-धंधे का कोई विकल्प नहीं रह गया है।
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100 वर्षों से यहां खेती कर रहे हैं लेकिन आज उनसे उनकी जमीन को ही छीन लिया गया। यह गरीबों के साथ सरासर अन्याय है। इसकी भरपाई कैसे होगी, यह समझ नहीं आ रहा।
मनोज।
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सब्जी बेचकर परिवार को पाल रहे थे। अब क्या काम करेंगे, क्या खाएंगे। कैंटोनमेंट बोर्ड को उनके परिवारों की तरफ देखना चाहिए था। यह बर्बरता पूर्ण कार्रवाई की गई है।
ज्ञान चंद।
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इस बंजर जमीन को अपने खून-पसीने से तैयार किया था। बोर्ड ने उनकी उम्मीदों व सपनों पर पानी फेर दिया है। सरकार को इस संबंध में कुछ विकल्प निकालना चाहिए था। ताकि रोजी-रोटी पर आंच न आए।
अजय।
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नोटिस देने के बाद सब्जी हटाने का समय भी नहीं दिया। पुलिस के साथ आई जेसीबी मशीनों ने सब तहस-नहस कर दिया। कमरे तोड़ दिए। ऐसा तो अंग्रेजों ने भी गरीबों के साथ नहीं किया था।
मनीष।
तोपखाना परेड में लगभग 21 एकड़ जमीन से कब्जा हटाया गया है। यह जमीन कैंटोनमेंट बोर्ड के अधीन है। इसकी लीज भी खत्म हो चुकी है और स्थानीय लोगों ने लगभग 10 वर्ष से किराया भी नहीं जमा करवाया। कोर्ट ने बोर्ड के हक में फैसला दिया था। इसलिए कार्रवाई से पहले 22 लोगों को नोटिस दिए गए थे ताकि वो अपनी फसल व सामान हटा सकें।
राहुल आनंद शर्मा, मुख्य अधिशासी अधिकारी, कैंटोनमेंट बोर्ड,अंबाला।