अंबाला। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद (एनसीईआरटी) ने अब रेट कांट्रेक्ट के माध्यम से साइंस किट को खरीदना बंद कर दिया है। सिर्फ साइंस किट ही नहीं बल्कि हिंदी, गणित, उर्दू जैसे विषयों की किटों को भी अब एनसीईआरटी नहीं खरीदेगा।
इस कारण स्थानीय कारोबारियों को 300 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। पहले एनसीईआरटी देशभर के शिक्षण संस्थानों को खुद किट खरीदकर भेजता था। इन किटों को खरीदने से पहले सैंपलों की जांच भी होती थी तभी कारोबारियों को टेंडर लेने की दौड़ में शामिल किया जाता था। सिस्टम ऐसा था कि अंबाला सहित अन्य जगहों के कारोबारी अच्छी गुणवत्ता की किट बेचकर व्यापार थे। मगर अब बीते छह माह से वह किट बचने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। वहीं अब कोई भी कितने भी रेट में किटों को खरीद सकता है कोई गुणवत्ता या मानक निर्धारित नहीं किया गया है। पहले एनसीईआरटी को यह जिम्मेदारी इसलिए दी गई थी क्योंकि वह एक देश में एक प्रकार की और अच्छी गुणवत्ता की किट शिक्षण संस्थानों को भेजें।
कमीशन उजागर होने के बाद लिया था फैसला
साइंस सिटी के कारोबारी अमित सक्सेना ने एनसीईआरटी नई दिल्ली के अधिकारियों पर रिश्वत का आरोप लगाया है। एनसीईआरटी के तत्कालीन डिविजनल ऑफिसर किट्स (डेक) विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. वीपी सिंह, पूर्व फोरमैन नीरज शर्मा और पूर्व सेक्शन आफिसर यज्ञदत्त शर्मा के खिलाफ अंबाला पुलिस को शिकायत दी गई थी। इसके बाद पुलिस ने तीनों आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, षडयंत्र सहित अन्य गंभीर धाराओं में केस दर्ज कर लिया था। पीड़ित साइंस कारोबारी का आरोप था कि आरोपी अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपने पद पर रहते हुए उनसे रिश्वत मांगी थी और मांग पूरी न होने पर कई राज्यों में साइंस किट भेजने के ऑर्डर में जानबूझकर देरी करवा दी, जिससे राज्यों में साइंस किट की आपूर्ति बाधित हुई।
अब प्राइवेट ऑर्डर पर ही निर्भर
कारोबारी अमित सक्सेना ने बताया कि विभिन्न राज्य साइंस और एजुकेशनल किटों के लिए एनसीईआरटी को ऑर्डर देते थे तो एनसीईआरटी आगे खरीद के लिए प्रक्रिया करती। मगर अब सभी साइंस कारोबारी प्राइवेट ऑर्डर पर ही निर्भर हैं। इस कारण से कारोबारियों का काफी नुकसान हो रहा है।