अंबाला सिटी। ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री मंजी (बाउली) साहिब में शहीदी सभा के दूसरे दिन बुधवार को प्रतिभागियों ने गुरबाणी कंठ से लेकर सिख मार्शल आर्ट और धार्मिक प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता में अपनी प्रतिभा का मंचन किया।
पांच साल की आयु वर्ग से लेकर 25 साल के युवाओं ने इसमें हिस्सा लिया। प्रतिभागियों ने न सिर्फ गुरबाणी कंठ मुकाबले में गुरबाणी सुना कर अतिथियों व संगत को मंत्रमुग्ध किया बल्कि आत्मरक्षा के गुर सिख मार्शल आर्ट के हैरतअंगेज करतब दिखा कर गतका प्रशिक्षण देने के लिए प्रेरित किया।
शहीदी सभा की शुरुआत गुरु चरणों में अरदास उपरांत हुई। इस दौरान बाबा हरबंस सिंह रवालो ने बच्चों को आशीर्वाद दिया। यह शहीदी सभा हरियाणा सिख गुरुद्वारा मैनेजमैंट कमेटी द्वारा श्री गुरु हरगोबिंद साहिब सेवा सोसायटी के सहयोग से करवाई गई है। शहीदी सभा का आयोजन धन-धन श्री गुरु तेग बहादुर साहिब, माता गुजर कौर जी और चार साहिबजादों और समूह शहीदों की शहादत को समर्पित था।
इसके तहत करवाई गई प्रतियोगिताओं का उद्देश्य बच्चों और युवा वर्ग को गुरमत ज्ञान देने के साथ-साथ उन्हें गुरबाणी से जोड़ना है। सभा के दौरान करवाई गई प्रतियोगिताओं में प्रतिभागियों ने अपनी प्रतिभा का मंचन करके गुरु की शिक्षाओं पर चलने के लिए सभी को प्रेरित किया, जिससे कि बच्चों सहित युवा वर्ग को धर्म व गुरमत ज्ञान देने के साथ गुरबाणी से जोड़ा जा सके। इस दौरान जज की भूमिका धर्म प्रचार के प्रचारक इंदरपाल सिंह, बचितर सिंह, मनप्रीत सिंह, गुरप्रीत सिंह, गुरमुख सिंह, गुरविंदर सिंह, प्रभजीत सिंह, परमिंदर कौर और अमलोक सिंह हीरा दिल्ली ने निभाई।
यह रहे मौजूद
समागम में एचएसजीएमसी के वरिष्ठ उपप्रधान सुदर्शन सिंह सहगल, कार्यकारिणी समिति सदस्य तरविंदर पाल सिंह, हरपाल सिंह कंबोज, इंदरजीत सिंह वासूदेवा, रजिंदर सिंह, कैप्टन दिलबाग सिंह, श्री गुरु हरगोबिंद साहिब सेवा सोसायटी अंबाला सिटी के प्रधान मनजीत सिंह, महिंदर सिंह, रणजीत सिंह बेदी, मोहन सिंह तोखड़ा, जगमोहन सिंह, जगजीत सिंह, भूपिंदर सिंह व इंदरपाल सिंह, तरणदीप सिंह सेठी, तजिंदर सिंह संधू, चरणजीत सिंह करनाल, मैनेजर प्रीतपाल सिंह, मुख्य ग्रंथी सतनाम सिंह सहित संगत ने शहीदों को अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए।
शहीदी सभा में अभिभावक प्रतियोगिता के दौरान विजेता प्रतिभागी को सम्मानित करते गणमान्य। संवाद- फोटो : अंबाला दिल्ली नेशनल हाइवे स्थित निर्माणाधीन शहीदी स्माकर। संवाद