पंडित प्रवेश उनियाल, श्री सनातन धर्म मंदिर, अंबाला छावनी।
अंबाला। कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकादशी, देवउठनी एकादशी, देवउठान एकादशी, देवउठनी ग्यारस अथवा प्रबोधिनी एकादशी आदि नाम से भी जाना जाता है। पंडित प्रवेश उनियाल बताते हैं कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी पूजन एवं तुलसी विवाह का उत्सव भारत में मनाया जाता है। कार्तिक मास में जो मनुष्य तुलसी का विवाह भगवान से करवाते हैं उनके पिछले जन्मों के पाप नष्ट होते हैं। इस दिन से सभी शुभ कार्य विवाह, उपनयन आदि शुभ मुहूर्त देखकर प्रारंभ किए जाते हैं।
उन्होंने बताया कि पद्मपुराण की कथा के अनुसार राजा जालंधर की पत्नी वृंदा के श्राप से भगवान विष्णु पत्थर बन गए। इस कारण भगवान को शालिग्राम भी कहा जाता है और श्रद्धालु इस रूप में भी भगवान की पूजा करते हैं। इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु को अपने शालिग्राम स्वरुप में तुलसी से विवाह करना पड़ा। तभी से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है।
उन्होंने बताया कि कुछ लोग एकादशी से पूर्णिमा तक तुलसी पूजन कर पांचवें दिन तुलसी विवाह करते हैं। शाम के समय तुलसी के पास गन्ने का भव्य मंडप बनाया जाता है उसमें शालिग्राम की मूर्ति रखते हैं और फिर विधि-विधान से विवाह संपन्न कराते हैं। मंडप, वर पूजा, कन्यादान, हवन और फिर प्रीति-भोज, पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ निभाया जाता है। इस दिन तुलसी के पौधे को यानी वधु को लाल चुनरी-ओढ़नी ओढ़ाई जाती है। तुलसी विवाह में सोलह शृंगार के सभी सामान चढ़ाने के लिए रखे जाते हैं। शालिग्राम को दोनों हाथों में लेकर यजमान वर के रूप में यानी भगवान विष्णु के रूप में और यजमान की पत्नी तुलसी के पौधे को दोनों हाथों में लेकर अग्नि के सात फेरे लेते हैं। विवाह के पश्चात प्रीतिभोज का आयोजन किया जाता है।