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डीएपी चाहिए तो किसानों को देना होगा प्रमाण पत्र

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नारायणगढ़। किसानों को अब डीएपी खाद चाहिए तो उन्हें ‘मेरी फसल मेरा ब्योरा‘ का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होगा। इसके लिए कृषि विभाग के एसडीओ ने सभी डीएपी विक्रेताओं को आदेश जारी कर दिए हैं। दूसरी ओर किसानों ने इस फरमान का विरोध किया है।
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गौरतलब है कि जिले में लगातार डीएपी खाद का संकट चल रहा है। ज्यादातर किसानों का कहना है कि उन्हें लाइनों में घंटों इंतजार करने के बाद भी डीएपी खाद नहीं मिल रही है। सोमवार को नारायणगढ़ अनाजमंडी में खाद के एक अधिकृत विक्रेता की दुकान पर डीएपी खाद की सूचना मिलते ही क्षेत्र के सैंकड़ों किसानों का तांता लग गया। सुबह लगभग आठ बजे से लाइनों में खड़े किसानों को अपराह्न तीन बजे तक भी खाद नहीं मिली। उन्हें खाली हाथ ही बैरंग लौटना पड़ा या फिर उन्हें एक या दो बैग ही डीएपी के उपलब्ध हो सके।
किसानों ने एजेंसी मालिक पर आरोप लगाया कि पहले तो उन्होंने हमारे आधार कार्ड ले लिए। उसके बाद जब लाइन में घंटों खड़े होने के बाद उनका नंबर आया, तब उन्हें यह कहकर लौटा दिया कि मेरी फसल मेरा ब्योरा के तहत कराए गए पंजीकरण का प्रमाण पत्र भी जरूरी है। इस कारण उन्हें डीएपी नहीं मिल सकेगी। इन निर्देशों पर किसानों ने रोष व्यक्त किया। किसानों का कहना है डीएपी न मिलने के कारण उन्हें गेहूं की बिजाई करने में देरी हो रही है।
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अगर कोई भी विक्रेता किसानों को खाद के साथ कोई भी अतिरिक्त वस्तु देता हुआ पाया जाता है तो उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई जाएगी। किसानों को मेरी फसल मेरा ब्योरा रजिस्ट्रेशन के प्रमाण पत्र के साथ ही डीएपी मिलेगा। पिछले दिनों नारायणगढ़ में 950 बैग और शहजादपुर में 850 बैग किसानों को वितरित किए गए हैं। - रौशन लाल, एसडीओ, कृषि विभाग।
किसान बोले
एजेंसी मालिक कभी आधार कार्ड की कॉपी लाने और कभी मेरी फसल मेरा ब्यौरा के तहत कराए गए रजिस्ट्रेशन के प्रमाण पत्र लाने की बात को कहकर टरका रहे है। सुबह से इंतजार कर रहे थे पर डीएपी नहीं मिला था। - सतपाल, किसान।
हम सुबह से लाइन में खड़ा थे। चार घंटे इंतजार करने के उपरांत एजेंसी मालिक ने मात्र दो बैग डीएपी के तथा उसके साथ एक 280 रुपये की दवाई भी जबरदस्ती दे दी। जो कि पूरी तरह से गलत है। - अश्वनी कुमार किसान
किसानों के पास कई-कई एकड़ जमीन है और जो प्रशासन डीएपी मुहैया करवा रहा है उससे तो एक एकड़ में भी काम नहीं चलेगा। समझ नहीं आ रहा है कि आखिर इतना परेशान क्यों किया जा रहा है। - स्वर्ण सिंह, किसान।
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