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Ambala News: देय अवकाश और रात्रि ठहराव कम, समय पर नहीं मिल रहा भुगतान

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अंबाला। आंधी, बारिश या फिर तूफान 24 घंटे रोडवेज का पहिया चलता है। आपातकाल में भी रोडवेज कर्मचारी सेवाएं देते हैं और यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचाते हैं। मगर रोडवेज कर्मचारियों को मिलने वाली कई सुविधाओं को कटौती हो रही है। यही कारण है कि अब रोडवेज कर्मचारी आंदोलन की रणनीति बना रहे हैं।
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राज्य मोर्चा सदस्य जयबीर घणघस ने बताया कि सरकार की ओर से कर्मचारियों के देय अवकाश कम किए गए, रात्रि ठहराव भी कम कर दिए इसके बाद भी कर्मचारियों को समय पर भुगतान नहीं मिलता। वर्ष 2002 और 2016 में लगे रोडवेज कर्मचारियों को आज तक पक्का नहीं किया है। बावजूद इसके कर्मचारियों को बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
पहले 33 अब 18 दिन की मिल रही छुट्टी
चालक-परिचालकों व कर्मशाला के कर्मचारियों के देय अवकाश कम कर दिए हैं। पहले एक साल में 33 देय अवकाश मिलते थे। जो सरकार की ओर से घटाकर अब एक साल में 18 देय अवकाश कर दिए है। जिसके कारण कर्मचारियों को लाखों रुपये का आर्थिक नुकसान और परेशानियों का सामना करना पड़ रहा हैं। इन अवकाश के चलते कर्मचारी अपने बच्चों के विवाह, मकान बनाना और अन्य तरह के काम निपटाते थे लेकिन अब उन्हें दिक्कत आ रही है।
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पहले 30 अब 10 कर दिए रात्रि ठहराव
पहले चालक-परिचालकों को एक महीने में 30 रात्रि ठहराव दिए जाते थे। पिछले काफी समय से 10 रात्रि ठहराव ही मिल रहे हैं। इन 10 रात्रि ठहराव का भुगतान भी मनमर्जी से किया जा रहा है। इसमें अधिकारियों द्वारा मुख्यालय से स्वीकृति के लिए फाइल इधर से उधर भटकती रहती है। समय पर भुगतान भी नहीं हो पाता। इसके कारण भी रोडवेज कर्मचारी परेशान रहते हैं। सरकार ने जो प्रदूषण रहित इलेक्ट्रिक बसें चलाई हैं उन्हें ठेके पर न लेकर रोडवेज बेडे में शामिल करे। ताकि सरकार द्वारा दी जाने वाली निशुल्क व कम दरों से जनता को सुविधा मिल सके।

2016 के कर्मचारी अब तक कच्चे
वर्ष 2016 में रोडवेज द्वारा सभी प्रकार की प्रक्रिया के तहत कर्मचारी लगाए गए थे। उन कर्मचारियों को अभी तक पक्का नहीं किया गया। इस महंगाई में बहुत ही कम 25 हजार रुपये में गुजारा करना पड़ रहा है।

23 साल पहले लगे 450 नहीं हुए पक्के
इसके साथ ही 2002 में जो लगभग 450 चालक लगाए गए थे उन्हें अभी तक पक्का नहीं किया। इन्हें नियुक्ति तिथि से पक्का किया जाए और पुरानी पेंशन में शामिल किया जाए। क्योंकि अधिकतर डिपुओं के चालक कोर्ट से केस जीत चुके हैं।
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