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Ambala News: दिव्यांगता के बावजूद उधार की गन लेकर झटका था पहला स्वर्ण

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अंबाला। एयर गन से चार साल तक अपने घर में बोर्ड पर निशानेबाजी की शुरूआत करने वाले दीपक सैनी आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। नौ साल की उम्र में सर से पिता का साया उठने के बावजूद दिव्यांग दीपक ने शूटिंग करने का निर्णय लिया। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण पहला पदक उधार की गन से हासिल किया था जो स्वर्ण पदक था। आज वह भारत ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीन पदक लेकर अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। पिता के देहांत के बाद घर में कमाने वाला कोई नहीं था। इसके बावजूद दीपक ने निशानेबाजी में अपने आप को निखारा और वह टोक्यो पैरालंपिक, राइफल शूटर इंटरनेशनल मेडलिस्ट खिलाड़ी बने।
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ऐसे हुई दीपक सैनी की निशानेबाजी की शुरूआत
टोक्यो पैरालंपिक, राइफल शूटर इंटरनेशनल मेडलिस्ट दीपक सैनी ने बताया कि सन 2004 में खेलों को देखकर मन में विचार आया कि वह भी खेलें। इसके बाद उन्होंने निशानेबाजी देखी और मन में निशानेबाजी करने की ठान ली।
सात तक वह निशानेबाजी की अकादमी की तलाश करते रहे। इस दौरान उन्होंने 15 साल की उम्र में 2007 में 2500 रुपये की कीमत की इंडियन एयर खरीदी ओर घर पर ही बोर्ड लगाकर निशानेबाजी का अभ्यास शुरू कर दिया।
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चार साल तक यह अभ्यास चलता रहा। इसके बाद 2011 में वह कुरुक्षेत्र गुरुकुल में नवीन जिंदल शूटिंग रेंज में पहुंचे। यहां पर उन्हाेंने दो साल तक निशानेबाजी का अभ्यास किया। इसके बाद वह महाराष्ट्र पुणे अकादमी में चले गए और वहां पर दो साल तक निशानेबाजी का कड़ा अभ्यास किया। इसके बाद दीपक सैनी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीन मेडल, 13 साल से नेशनल में लगातार स्वर्ण पदक
यह रही उपलब्धि
दीपक सैनी के पास 130 स्वर्ण, 10 रजत और 09 कांस्य पदक है। इसमें तीन अंतरराष्ट्रीय पदक शामिल है, जिसमें दो रजत, एक कांस्य पदक है। वह लगातार 13 साल तक नेशनल में स्वर्ण पदक विजेता हैं, 2017 में थाईलैंड में आयोजित वर्ल्ड कप में रजत पदक, दिल्ली में 2024 में कांस्य पदक और पौलेंड में 2015 में आयोजित चैंपियनशिप में रजत पदक विजेता हैं।
वहीं 2021 में टोक्यो में आयोजित पैरालंपिक में दीपक सैनी की भागीदारी रही। पुणे महाराष्ट्र 5वीं पैरा नेशनल चैंपियनशिप शूटिंग में नए इवेंट पैरा ट्रैप शूटिंग में स्वर्ण पदक विजेता। मौजूदा समय में वह अपनी शूटिंग अकादमी चलाते हैं। अब तक वह 70 बच्चों को को निशानेबाजी की ट्रेनिंग दे चुके हैं और 30 बच्चों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। जबकि प्रतियोगिताओं के लिए खुद भी तैयारियां कर रहे हैं।
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