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मनरेगा घोटाले की फाइल दबाकर बैठी रही सरकारें

Tue, 30 May 2017 12:31 AM IST
रमिंद्र सिंह/अमर उजाला अंबाला
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मनरेगा घोटाले की फाइल दबाकर बैठी रही सरकारें - फोटो : Amar Ujala
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मनरेगा घोटाले की जांच पूरी किए विजिलेंस विभाग को साढ़े चार वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, मगर सरकारें इस घोटाले में लिप्त अफसरों पर कार्रवाई करने के बजाए मामले को ही दबाती रही। यदि यह मामला लोकायुक्त तक नहीं पहुंचता तो शायद ही इस मामले में आईएएस अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज करने की स्तुति की जाती। अंबाला में हुए करोड़ों रुपये के घोटाले में लापरवाह अफसरों पर सरकारें पूरी तरह से मेहरबान बनी रही। विजिलेंस विभाग की रिपोर्ट पर कार्रवाई करना सरकार ने उचित नहीं समझा। केवल वन अधिकारी व अन्य कर्मियों पर गाज गिराकर बड़े अफसरों को बचाने का खेल पूरा खेला गया। अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नवंबर 2012 में विजिलेंस ने जारी पूरी कर सरकार को रिपोर्ट दे दी थी, मगर कांग्रेस व भाजपा सरकार ने आज तक इस मामले में केस दर्ज करने की सिफारिश खुद नहीं की। मामले के शिकायतकर्ता पीपी कपूर भी मानते हैं कि दोनों सरकारें गंभीर होती तो अब तक घोटाला करने वाले अधिकारी सलाखों के पीछे होते। मगर अब लोकायुक्त की सिफारिश पर आईएएस अधिकारी समीरपाल सरो, मोहम्मद शाइन, रेणु फुलिया व सुमेधा कटारिया पर गाज गिरना तय है।
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सीधे वन विभाग को रिलीज हुए 25 करोड़
जिले में मनरेगा के तहत 2007 से 2010 तक खर्च हुई राशि में नियमों की धज्जियां उड़ाई गई। करीब 25 करोड़ की राशि वन विभाग को सीधे ही रिलीज कर दी गई। जो कार्य मजदूरों से कराने का दावा वन विभाग ने किया उसमें ज्यादातर जगहों पर कुछ नहीं पाया गया। यानी कागजों में जहां काम दिखाया वहां हकीकत में कुछ नहीं हुआ था। राशि फर्जी लोगों के नाम जारी की गई। हर्बल पार्क, रास्ते, कंकरीट की सड़के कागजों में तो बनी दिखाई पर हकीकत में वहां कुछ भी नहीं पाया गया। इतना ही नहीं वन विभाग भी अपने द्वारा किए गए कार्यों की सही जानकारी जांच कर रही विजिलेंस या अधिकारियों की टीम को नहीं दे सका।

विभिन्न स्तर पर हुई जांच
पहले इस मामले को लेकर दो एडीसी व एसडीएम द्वारा मामले की जांच कर रिपोर्ट मुख्यालय भेजी गई थी। बाद में विजिलेंस ने जब जांच की तो कई बार अंबाला आकर रिकार्ड को खंगाला गया। इस दौरान कई अनियमितताएं टीम को मिली।
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विजिलेंस एफआईआर में यह गड़बड़ियां
विजिलेंस द्वारा दर्ज एफआईआर में वन विभाग को जारी किए गए कुल 25.13 करोड़ रुपये पर सवाल खड़े किए गए हैं।
इनमें हर्बल पार्क के विकास में 55.50 लाख की गड़बड़ी।
नर्सरी के विकास के विकास में 1.70 करोड़ की गड़बड़ी।
विभिन्न गांवों में रास्ते के विकास में 1.90 करोड़ की गड़बड़ी।
मजदूरों को दी गई 61.68 लाख की राशि में गड़बड़ी।
मंडौर व शहजादपुर गांव में विकास कार्यों में 15 लाख की गड़बड़ी।
कंकरीट सड़क निर्माण में 2.28 लाख की गड़बड़ी व अन्य कई गड़बड़ियां उजागर की गई हैं।
विजिलेंस ने 400 पन्नों की रिपोर्ट नवंबर 2012 में प्रदेश सरकार को सौंप दी थी।

नौ पर हो चुका मामला दर्ज
इस मामले की गाज अभी तक वन विभाग के अधिकारियों व कर्मियों पर गिर चुकी है। जनवरी 2015 में विजिलेंस ने वन अधिकारी जगमोहन शर्मा, प्रशांत शर्मा व राजेश शर्मा के अलावा रेंज वन अधिकारी गोकुल शर्मा, दीपक, विनोद कुमार और सुरेंद्र नागर को नामजद किया था। सभी को सस्पेंड किया जा चुका है जबकि विभाग से रिटायर्ड हुए रेंज वन अधिकारी लक्ष्मण दास व अधीक्षक चंद्रमोहन के खिलाफ भी मामला दर्ज हो चुका है।
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