रूस और यूक्रेन की जंग के बीच खारकीव शहर से अपने गांव बुडियों पहुंची आंचल को देखते ही उसकी मां ने गले लगा लिया। आंचल की आंखों से भी आंसू छलक पड़े। सूचना पाकर मौके पर सभी परिजन सहित आस पड़ोस के लोग उसका हाल जानने पहुंचे।
वहीं भारतीय सेना से रिटायर पिता रमेश पाल की खुशी का ठिकाना नहीं था। रमेश अपनी बेटी को शाहबाद से लेकर अपने गांव पहुंचे। आंचल ने बताया कि जंग के पहले ही दिन उन्होंने मिसाइल को फटते हुए देखा। वह उस दिन रसोई में काम कर रही थी, कुछ ही देर बाद बमबारी की आवाजें आने लगी। बमबारी के बाद यूनिवर्सिटी में भी भगदड़ का माहौल पैदा हो गया था। आंचल ने बताया कि वह दो दिन बंकर में ही रही।
हालातों को देखते हुए आंचल ने वहां से निकलना ही सही समझा। 26 फरवरी को वह अपने साथ केवल जरूरत का सामान लेकर यूनिवर्सिटी से निकली। शहर में कर्फ्यू जैसे हालात होने के कारण कोई टैक्सी नहीं मिली, इसके चलते आंचल ने मैट्रो स्टेशन तक का करीब 10 किलोमीटर का सफर पैदल तय किया। इस दौरान बमबारी की आवाजें आती रही।
किसी तरह मेट्रो में सवार होकर 27 फरवरी को आंचल लवील शहर पहुंची। 28 फरवरी को बस में सवार होकर उदोगरोद शहर पहुंची। आंचल ने बताया कि उसने उदोगरोद जाने के लिए पांच गुना किराया दिया, जहां पर दोस्तों से संपर्क कर सभी बॉर्डर के हालात जाने तो हंगरी बॉर्डर पर हालात सही पता चले और आंचल हंगरी बॉर्डर के लिए चल दी। एक मार्च को आंचल ने सभी औपचारिकताएं पूरा कर बॉर्डर पार किया। हंगरी में वॉलंटियर्स से संपर्क किया गया, जहां उन्हें एक अच्छे होटल में नि:शुल्क रखा गया। जिसके बाद 2 मार्च रात को आंचल की फ्लाइट हंगरी से भारत के लिए चली। 3 मार्च को सुबह फ्लाइट दिल्ली एयरपोर्ट पहुंची।
आंचल ने बताया कि चॉप शहर में रजिस्ट्रेशन के लिए लंबी लाइन लगी थी, लेकिन वहां पर भारतीयों की अपेक्षा यूक्रेन के लोगों को ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही थी। इसके चलते उन्हें वहां काफी लंबा इंतजार करना पड़ा। आंचल ने बताया कि जब उन्होंने खारकीव शहर छोड़ा तो उसके बाद वहां के हालात ज्यादा बिगड़ गए।
आंचल ने बताया कि यूक्रेन के हालात सही नहीं है। वहां सब कुछ नष्ट हो गया है। अब उम्मीद नहीं है कि जल्द ही सब कुछ सही हो पाएगा, लेकिन अगर हालात सही होते हैं तो वह यूक्रेन जाकर अपनी डिग्री को जरूर पूरा करेंगी। आंचल ने बताया कि वह एमबीबीएस के पांचवे वर्ष में पढ़ रही है।