जब वह फिरोजपुर (पंजाब) में ब्रिटिश सेना में कार्यरत थे तो उन्होंने सुभाष चंद बोस के आह्वान पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध विद्रोह का झंडा बुलंद करते हुए ब्रिटिश अधिकारियों के आदेशों को मानने से साफ इंकार कर दिया। यही नहीं उन्होंने रेजीमेंट में ही इंकलाब-जिंदाबाद और अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे लगाए। इसके बाद छज्जू राम को ब्रिटिश अधिकारियों ने सेना से डिसमिस कर दिया और घोड़े के पीछे बांधकर घसीटा।
फिर उन्हें मियां वाली जेल ( जो अब पाकिस्तान में है) में डाल दिया। जेल में भी ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें काफी यातनाएं दी। यहां उनकी मुलाकात चौधरी देवी लाल ( पूर्व उप-प्रधानमंत्री) से हुई, जिसके बाद उन्होंने किसानों और मजदूरों का जीवन स्तर सुधारने के लिए भी कार्य किया।
वर्तमान में जिला बार एसोसिएशन के पूर्व प्रधान अधिवक्ता दिलबाग सिंह दानीपुर (स्वतंत्रता सेनानी छज्जूराम के बेटे) ने बताया कि उनके पिता 1960 से 1963 तक पांच गांव की पंचायतों के प्रतिनिधि रहे। छप्परा को-आपरेटिव बैंक के प्रधान के रूप में भी कार्य किया। 1987 से 1991 तक एमआईटीसी (माइनर इरिगेशन ट्यूबवेल कार्पाेरेशन) बोर्ड के निदेशक रहे।
इसके अलावा मार्केट कमेटी इस्माइलाबाद के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने दानीपुर गांव में उच्च विद्यालय का निर्माण करवाया और कई उल्लेखनीय कार्य किए। दिलबाग दानीपुर ने बताया कि वह चार भाई हैं। उनकी तीन बहनें हैं। दानीपुर गांव में राजकीय स्कूल का नाम भी श्री छज्जू राम स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर रखा गया है।
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था सम्मानित
1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने छज्जू राम को स्वतंत्रता के 25 वर्ष के अवसर पर स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के लिए ताम्रपत्र भेंटकर सम्मानित किया था। इसके बाद इंदिरा गांधी की ओर से लगाए गए आपातकाल में भी छज्जू राम ने मुखर विरोध किया था। इस कारण 1975 से 1977 तक उन्हें फिर से जेल में रहना पड़ा था। छह नवंबर 2012 को छज्जू राम का देहांत हो गया। उनकी पत्नी विद्या देवी को बीते वर्ष 15 अगस्त को भी सरकार ने सम्मानित किया था।