अमर उजाला ब्यूरो
अंबाला सिटी। अंबाला नगर निगम को भंग करने के लिए हाईकोर्ट में वर्ष 2010 में याचिका दायर करने वाले भाजपा के पूर्व पार्षद कमल किशोर जैन व अन्य ने अपने कदम वापस खींच लिए हैं। याचिका दायर करने के आठ वर्षों बाद उन्होंने अपनी याचिका को वापस ले लिया जिसके बाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को इस केस को खारिज कर दिया है। मगर, इसी केस के साथ संबद्ध हरियाणा सरकार के अंबाला नगर निगम को भंग करने के फैसले के खिलाफ कांग्रेस पूर्व पार्षदों द्वारा दायर मामले में अब सात अक्तूबर को सुनवाई होगी। इस अवधि तक अंबाला नगर निगम की कमान निगम के प्रशासक एवं कमिश्नर के हाथों में ही रहेगी।
नगर निगम को लेकर अंबाला में कांग्रेस और भाजपा में प्रतिष्ठता का सवाल बन गया है। एक ओर भाजपा नगर निगम भंग कर वापस नगर परिषद का गठन करना चाह रही है जबकि कांग्रेस नगर निगम के पक्ष में है। इसी को लेकर हाईकोर्ट में मामला विचाराधीन है जिस पर ट्विन सिटी के लोगों की निगाहें टिकी हुई हैं।
वर्ष 2010 में दायर की थी याचिका
पूर्व में कांग्रेस की हुड्डा सरकार ने वर्ष 2010 में अंबाला नगर परिषद को खत्म कर नगर निगम का गठन किया था। सरकार के इस निर्णय को भाजपा के पूर्व पार्षद कमल किशोर जैन एवं अन्य ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए राज्य सरकार के खिलाफ याचिका दायर की थी जिस पर सुनवाई चल रही थी। इसी बीच 17 फरवरी को खट्टर सरकार ने अंबाला नगर निगम को भंग कर वापस नगर परिषद गठन की घोषणा कर दी थी। याचिकाकर्ता जैन ने बताया कि उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका निगम को भंग करने के लिए दायर की थी और फरवरी में सरकार ने स्वयं ही निगम को भंग करने की घोषणा की थी जिससे उनका मकसद पूरा हो गया है। अब उन्होंने हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका वापस ले ली है जिसके बाद उनका केस खारिज हो गया है।
कांग्रेस पूर्व पार्षदों की याचिका पर सात अक्तूबर को सुनवाई
नगर निगम भंग करने के खट्टर सरकार के निर्णय के खिलाफ अदालत में अब सात अक्तूबर को सुनवाई होगी। कांग्रेस के पूर्व पार्षद जरनैल सिंह माजरा ने फरवरी में सरकार के निगम भंग करने के निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी जिसपर अभी सुनवाई चल रही है। याचिकाकर्ता के वकील मुकुल अग्रवाल ने बताया कि मंगलवार सुनवाई के दौरान पुरानी याचिका वापस लेने पर उस केस को खारिज किया गया है जबकि जरनैल माजरा द्वारा दायर याचिका पर अब सात अक्तूबर को कोई निर्णय होने की उम्मीद है। बता दें कि नगर निगम का चुनाव जून 2013 में हुआ था जिसके और अब बीती एक जुलाई को अंबाला नगर निगम का पहला कार्यकाल पूरा हो चुका है।
निगम या परिषद, प्रशासन ने की अपनी तैयारी
अंबाला में नगर निगम होगा या फिर नगर परिषद की पुरानी व्यवस्था लौटेगी, इस पर लोगों के अलावा प्रशासन की भी निगाहें टिकी हुई है। यदि निगम बरकरार रहा तो पूर्व कार्यकाल की तरह इस बार भी 20 वार्डों का होना तय है, मगर यदि नगर परिषद दोबारा अस्तित्व में आई तो हालात कुछ अलग हो सकते हैं। ट्विन सिटी में पहले नगर परिषद के सिटी व कैंट में 30-30 वार्ड थे, मगर अब जनसंख्या में इजाफा हो चुका है, ट्विन सिटी में करीब 4.05 लाख जनसंख्या है जिस वजह से 62 से 64 वार्ड भी हो सकते हैं। प्रशासन द्वारा इसकी पूरी तैयारी कर ली गई है। फरवरी में निगम भंग करने से पहले सरकार को इसकी रिपोर्ट बनाकर भी जिला प्रशासन द्वारा सौंपी जा चुकी है।
कांग्रेस के आरोप, निगम चुनाव लटका रही सरकार
कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सरकार निगम चुनावों को लटकाना चाह रही है। महिला प्रदेश कांग्रेस की सचिव रेखा परुथी ने कहा कि अंबाला नगर निगम को लेकर केस अदालत में विचाराधीन है, मगर प्रदेश में शेष छह नगर निगम चुनावों की सरकार क्यों घोषणा नहीं कर रही है जबकि हर नगर निगम में चुनाव पेंडिंग हैं। सरकार चुनाव न कराकर समय आगे बढ़ा रही है जोकि सही नहीं है। अंबाला में निगम की व्यवस्था परिषद से बेहतर है और भाजपा केवल अपने राजनीतिक फायदे के लिए निगम भंग करना चाहती है।
कोट्स
- हमने नगर निगम गठन के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। अब सरकार ने फरवरी में निगम को भंग कर वापस नगर परिषद की गठन का फैसला लिया है। जिस मकसद से केस दायर किया था वह सरकार के निर्णय के बाद पूरा हो चुका है, इस वजह से दायर याचिका वापस ली गई है।
-कमल किशोर जैन, पूर्व पार्षद एवं याचिकाकर्ता।
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- खट्टर सरकार ने निगम को भंग कर कांग्रेस सरकार के फैसले एवं जनता हित के विपरीत कार्य किया है। नगर निगम भंग होने से अंबाला की जनता को नुकसान होगा। निगम में विकास कार्यों के लिए बड़ा फंड उपलब्ध होता है, जबकि परिषद में ऐसा नहीं है। सरकार के निर्णय के खिलाफ डटकर अदालत में केस लड़ा जाएगा।
-जरनैल सिंह माजरा, पूर्व पार्षद एवं याचिकाकर्ता।
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