अंबाला कैंट विधानसभा सीट
- फोटो : AMAR UJALA
हरियाणा विधानसभा का चुनावी रण सज चुका है। भाजपा, कांग्रेस समेत तमाम दल चुनाव प्रचार में ताकत झोंक रहे हैं। रूठों को मनाने का दौर भी चल रहा है तो विरोधी द्वारा अपने साथ मिलाने की कोशिशें भी हो रही हैं। इस राजनीतिक उठापटक के बीच कुछ खास सीटों पर सबकी नजरें हैं। इन सीटों में अंबाला कैंट विधानसभा सीट भी शामिल है। ये वही सीट है जहां से हरियाणा के दिग्गज नेता और पूर्व गृह मंत्री अनिल विज चुनाव मैदान में हैं। विज भी कुछ समय पहले तक रूठे नेताओं वाली सूची में बताए जा रहे थे। ये पहली बार नहीं था जब विज के रूठने की खबरें चली हों।
हमारी खास पेशकश ‘सीट का समीकरण’ में आज इसी अंबाला कैंट सीट की बात करेंगे। इसके चुनावी इतिहास की बात करेंगे। बात करेंगे यहां से जीते उम्मीदवारों की, पिछले चुनाव में इस सीट पर क्या हुआ था? इस बार कैसे समीकरण बन रहे हैं? ये भी जानेंगे…
पहले जान लेते हैं अंबाला कैंट सीट के बारे में
अंबाला जिला कार्यवाहक मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का गृह जिला है। जिले में कुल चार विधानसभा सीटें हैं। इनमें अंबाला शहरी, अंबाला छावनी, मुलाना और नारायणगढ़ शामिल हैं।अंबाला के चारों विधानसभा क्षेत्र में इस बार कुल 39 उम्मीदवार मैदान में हैं। जिले में पहले पांच विधानसभा क्षेत्र होते थे, 2008 के परिसीमन में नग्गल विधानसभा क्षेत्र खत्म होने के बाद चार रह गए। 1967 के बाद जिले में कोई नया विधानसभा क्षेत्र नहीं बना है। अंबाला छावनी विधानसभा सीट की बात करें तो पूर्व गृह और स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज यहां के मौजूदा विधायक हैं। इस सीट पर दो लाख छह हजार से ज्यादा मतदाता उम्मीदवार की किस्मत का फैसला 5 अक्तूबर को करेंगे।
पहले चुनाव में जीते थे देवराज
बात अंबाला छावनी सीट पर अब तक हुए विधानसभा चुनावों की कर लेते हैं। 1966 में हरियाणा राज्य के गठन के बाद राज्य में पहला विधानसभा चुनाव 1967 में हुआ। इस चुनाव में अंबाला कैंट यानी छावनी विधानसभा सीट से देवराज आनंद को जीत मिली। कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के रूप में उतरे देवराज आनंद ने भारतीय जन संघ के पी. नाथ को एक करीबी मुकाबले में 498 वोट से शिकस्त दी थी।
हरियाणा में 1967 के बाद अगला विधानसभा चुनाव अगले ही साल यानी 1968 में हुआ। इस चुनाव में भी अंबाला कैंट में भारतीय जनसंघ की तरफ से उतरे भगवान दास को जीत मिली। जनसंघ उम्मीदवार ने कांग्रेस के देवराज आनंद को 1,403 वोट से हराया था।
1972 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में मौजूदा विधायक भगवान दास को हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस के हंस राज सूरी ने भगवान दास को 4,512 वोट से शिकस्त दी।
महज 25 साल की उम्र में पहली बार यहीं से जीतीं सुषमा स्वराज
साल 1977, आपातकाल के बाद हरियाणा में विधानसभा चुनाव होते हैं। इस चुनाव में अंबाला कैंट से महज 25 साल की एक युवा महिला नेता को जीत मिलती है। ये युवा महिला नेता न सिर्फ चुनाव जीतती हैं बल्कि राज्य में गठित हुई देवीलाल सरकार में मंत्री भी बनाई जाती हैं। महज दो साल बाद यही महिला नेता हरियाणा में अपनी पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष भी बन जाती है। इस महिला की राजनीतिक सफलता का यह दौर यहीं नहीं थमता। आगे चलकर देश की राजनीति का एक बड़ा चेहरा बन जाती हैं। विधायक, हरियाणा सरकार में मंत्री ही नहीं आगे चलकर यह महिला नेता दिल्ली की मुख्यमंत्री और भारत की विदेश मंत्री भी बनती हैं। हम बात कर रहे हैं भाजपा की दिग्गज नेता रहीं सुषमा स्वराज की। 1977 के चुनाव में अंबाला कैंट सीट पर जनता पार्टी के टिकट पर उतरीं सुषमा ने कांग्रेस के पूर्व विधायक देवराज आनंद को 9,824 वोट से शिकस्त दी थी। जीत के बाद सुषमा देवीलाल सरकार में मंत्री बनाई गईं। 25 वर्षीय सुषमा स्वराज को सामाजिक कल्याण, श्रम और रोजगार जैसे आठ विभागों की जिम्मेदारी दी गई।
सुषमा को मंत्री पद से हटाया गया लेकिन वापस लेना पड़ा फैसला
सुषमा के विरोधी उनके मंत्री बनने का विरोध कर रहे थे, लेकिन जनता पार्टी की राष्ट्रीय इकाई का दबाव इतना ज्यादा था कि देवीलाल को सुषमा को मंत्री बनाना पड़ा। सुषमा मंत्री तो बन गईं। मगर नवंबर 1977 में विरोधी इस कदर हावी हो गए कि उन्होंने सुषमा को मंत्रीमंडल से हटाने की लॉबिंग शुरू कर दी।
अंतत: विरोधी कामयाब हुए और अचानक सुषमा स्वराज को कैबिनेट से हटाने का फरमान जारी हो गया। सुषमा स्वराज को क्यों हटाया गया, इसके पीछे तत्कालीन देवीलाल सरकार ने कोई स्पष्ट वजह नहीं बताई। सुषमा ने सरकार से उन्हे मंत्रीमंडल से हटाने का कारण जानना चाहा, मगर उन्हे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। जिस पर सुषमा ने इसकी शिकायत जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर से की।
उधर, सुषमा जार्ज फर्नांडीस की भी गुड बुक में थी। जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने सुषमा को बिना किसी ठोस कारण के हटाने की बात पर खासी नाराजगी जताई और देवीलाल को दो टूक कहा गया कि सुषमा को कैबिनेट में वापस लिया जाए या फिर उन्हें सीएम पद गंवाना पड़ सकता है। केंद्रीय नेतृत्व केदबाव में देवीलाल को अपना फैसला पलटना पड़ा और सुषमा स्वराज को दोबारा अपनी कैबिनेट में मंत्री बनाना पड़ा।
वापस अंबाला कैंट विधानसभा सीट पर लौटते हैं। साल 1982, एक बार फिर राज्य विधानसभा चुनाव होते हैं। इस चुनाव में अंबाला कैंट से कांग्रेस के उम्मीदवार रामदास धमीजा को जीत मिलती है। धमीजा ने इस चुनाव में जनता पार्टी के स्वामी अग्निवेश को 6,211 वोट से हराया था।
सुषमा फिर दर्ज करती हैं जीत
1987 के चुनाव में अंबाला कैंट पर एक बार फिर सुषमा स्वराज उतरीं। सुषमा इस बार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर मैदान में थीं। सुषमा ने कांग्रेस के रामदास धमीजा को 7,972 मतों से शिकस्त दी। इस चुनाव के बाद हरियाणा में भाजपा-लोकदल की सरकार बनी। इस सरकार में सुषमा हरियाणा की शिक्षामंत्री बनाई गईं थीं। शिक्षा मंत्री के तौर पर उन्होंने एक नया प्रयोग किया। उन्होंने हर जिले में दरबार लगाकर वहीं शिक्षकों की हर तरह की समस्याओं का समाधान करना शुरू कर दिया। इससे पहले कई शिक्षक अपने मूल शिक्षण कार्य को छोड़कर अपनी समस्याओं के समाधान के लिए चंडीगढ़ के चक्कर लगाते रहते थे और इससे बच्चों की पढ़ाई का बहुत प्रभावित होती थी।
अप्रैल 1990 में सुषमा राज्यसभा के सदस्य के रूप में चुन ली गईं। सांसद बनने के बाद उन्होंने अंबाला कैंट विधानसभा सीट से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के बाद अंबाला कैंट सीट पर उप-चुनाव हुआ। इस चुनाव में अंबाला कैंट सीट से भाजपा जिस चेहरे पर दांव लगाती है उसे यहां से जीत मिलती है। यह चेहरा न सिर्फ चुनाव जीतता है बल्कि आगे चलकर अंबाला कैंट सीट का पर्याय बन जाता है। ये चेहरा होते हैं अनिल विज, 1990 के उप-चुनाव चुनाव में अनिल विज को जीत मिलती है।
एक साल बाद ही राज्य में विधानसभा चुनाव होते हैं तो अंबाला कैंट सीट पर नतीजे बदल जाते हैं। कांग्रेस के उम्मीदवार बृज आनंद भाजपा उम्मीदवार अनिल कुमार को 8,017 मतों से हरा देते हैं। 1991 के बाद हरियाणा में अगले विधानसभा चुनाव 1996 में हुए। इस चुनाव में भाजपा ने अनिल विज का टिकट काट दिया। उनकी जगह पार्टी ने कबीर देव के मैदान में उतारा। वहीं, अनिल विज निर्दलीय मैदान में उतर गए। निर्दलीय उतरे विज ने कांग्रेस की राज रानी को 6,090 वोट से हरा दिया। जबकि, भाजपा उम्मीदवार तीसरे स्थान पर खिसक गए।
लगातार दूसरी बार निर्दलीय जीते विज
1996 के बाद हरियाणा में अगले विधानसभा चुनाव 2000 में हुए। इस चुनाव में भी अनिल विज निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतरे। भाजपा ने एक बार फिर कबीर देव टिकट दिया। इस बार भी अनिल विज ने जीत दर्ज की। ये जरूर रहा कि भाजपा के कबीर देव इस बार पिछली बार के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया और दूसरे नंबर पर रहे। विज ने उन्हें 9,057 वोट से शिकस्त दी।
निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर हैट्रिक नहीं लगा सके विज
2005 में अंबाला कैंट सीट से एक बार फिर अनिल विज निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतरे थे। उनके सामने कांग्रेस ने देवेंद्र बंसल को उतारा तो भाजपा ने रवि सहगल को टिकट दिया। इस चुनाव में कांग्रेस के देवेन्द्र कुमार बंसल ने निर्दलीय अनिल विज को महज 615 वोट से हराकर विज की जीत की सिलसिला फिर से तोड़ दिया। इस चुनाव में भाजपा के रवि सहगल अपनी जमानत तक नहीं बचा सके और चौथे स्थान पर रहे।
18 साल बाद विज फिर भाजपा उम्मीदवार बने
2005 के बाद हरियाणा में अगले विधानसभा चुनाव 2009 में हुए। इस चुनाव में अनिल विज भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे। 1991 के बाद एक बार फिर विज और भाजपा एक साथ थे। विज और भाजपा दोनों के लिए यह साथ फायदेमंद रहा। विज ने कांग्रेस उम्मीदवार निर्मल सिंह को इस चुनाव में 6,338 को वोट से हरा दिया। यह अंबाला कैंट सीट पर अनिल विज की चौथी जीत थी।
इसके बाद 2014 में अंबाला कैंट की सियासी लड़ाई एक बार फिर अनिल विज के नाम रही। भाजपा के टिकट पर उतरे विज ने कांग्रेस प्रत्याशी निर्मल सिंह को 15,462 मतों के अंतर से शिकस्त दी।
2019 के चुनाव में अनिल विज भाजपा के टिकट पर उतरे। विज ने निर्दलीय उम्मीदवार चित्रा सरवारा को 20,165 मतों से हराया। चित्रा कांग्रेस से बगावत करके मैदान में उतरी थीं। भाजपा प्रत्याशी को 64571 वोट मिले जबकि निर्दलीय प्रत्याशी को 44406 वोट मिले। भाजपा उम्मीदवार विज की यह अंबाला कैंट से छठी जीत थी।
पूर्व गृहमंत्री अनिल विज
- फोटो : अमर उजाला
इस बार कौन आमने-सामने
अब बात 2024 के चुनाव की कर लेते हैं। हरियाणा की अंबाला कैंट सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो गया है। यहां पर त्रिकोणीय समीकरण हैं। एक तरफ छह बार के विधायक और पूर्व गृह और स्वास्थ्य मंत्री रहे अनिल विज हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस से पूर्व पार्षद परविंद्र सिंह परी मैदान में हैं। इसके साथ कांग्रेस से बगावत कर निर्दलीय नामांकन भरने वाली चित्रा सरवारा भी मैदान में है। पिछली बार चित्रा ने विज के सामने 36 प्रतिशत से अधिक वोट लिए थे। जबकि विज को 53.04 प्रतिशत मतों के साथ जीत मिली थी। इस सीट पर कुल 11 प्रत्याशी मैदान में हैं।
चुनावी मैदान में विज करोड़ों के विकास कार्यों को बता रहे हैं तो निर्दलीय चित्रा और कांग्रेस के परी भाजपा पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए मुकाबला कर रहे हैं। अगर जातीय समीकरणों को देखें तो विज और परी दोनों ही पंजाबी समाज से आते हैं, जिससे यहां समाज का वोट बंट सकता है। इसके साथ ही चित्रा एकमात्र जाट उम्मीदवार हैं। ऐसे में जाट फैक्टर अभी यहां नहीं दिखाई देता है। लेकिन इतना जरूर माना जा रहा है कि यहां मुकाबला त्रिकोणीय होगा।
इसके साथ ही इनेलो-बसपा के गठबंधन से प्रत्याशी ओंकार सिंह अपना चुनावी गणित लगाकर प्रतिद्वंद्वियों का समीकरण बिगाड़ने में जुटे हैं। इनके अलावा आम आदमी पार्टी से राजविंदर कौर, जननायक जनता पार्टी से अवतार सिंह, युगा थुलासी पार्टी से नवीन कुमार, निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जसविंदर, सुधीर कुमार, रामसिंह, सुनील वर्मा, नवीन बिदला और धर्मेश सूद मैदान में हैं।
कैंट विधानसभा सीट पर वर्ष 1967 से लेकर आज तक कुल 14 बार विधानसभा चुनाव हुए हैं। इसमें 13 बार पंजाबी चेहरे को ही जनता ने चुना है। हालांकि वर्ष 2005 में कांग्रेस से देवेंद्र कुमार बंसल इकलौते ऐसे विधायक बने थे जोकि वैश्य समाज से आते हैं। यहां भाजपा हो या कांग्रेस सभी की पहली पसंद पंजाबी उम्मीदवार रहा है, क्योंकि यह क्षेत्र शुरुआत से पंजाबी बहुल रहा है। इसलिए यहां पर क्षेत्रीय ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय पार्टियों की पहली पसंद पंजाबी समाज से आने वाले उम्मीदवार रहे। यहां से देवराज आनंद, भगवान दास, हंसराज सूरी, सुषमा स्वराज, रामदास धमीजा, अनिल विज, बृज आनंद और देवेंद्र कुमार बंसल विधायक रहे हैं।