कला की कोई सीमा नहीं होती। यह कभी रंगों में तो कभी सुरों में, अभिनय में और कहानियों के माध्यम से अपनी पहचान बनाती है। शहर के कई कलाकार अपनी प्रतिभा और रचनात्मकता के दम पर कला के अलग-अलग क्षेत्रों में शहर का नाम रोशन कर रहे हैं।
कोई पुणे के फिल्म संस्थान में अभिनय और प्रोडक्शन डिजाइन की बारीकियां सीख रहा है तो कोई राष्ट्रीय मंचों पर लोकसंगीत और रंगमंच के जरिए अपनी पहचान बना रहा है। विश्वविद्यालय से राष्ट्रीय युवा महोत्सव तक मिली उपलब्धियां। साथ ही मुंबई में फिल्मों के लिए जारी प्रयास इन कलाकारों के हुनर और मेहनत की कहानी बयां करते हैं।
रंगमंच से फिल्मों तक, अभिनय में बना रहे पहचान
फिल्म निर्माण की बारीकियों को समझते हुए दिव्य शुक्ला
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
आजादनगर तारामंडल के दिव्य कुमार शुक्ला ने रंगमंच से अपने अभिनय के सफर की शुरुआत की। रंगाश्रम में किशन चंद्र सेन के सानिध्य में अभिनय की बारीकियां सीखीं और धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई। भारतेन्दु नाट्य अकादमी, लखनऊ से थिएटर में डिप्लोमा और एफटीआईआई, पुणे से स्क्रीन एक्टिंग में मास्टर्स करने तक का सफर उनकी मेहनत का प्रमाण है। अब मुंबई में रहकर फिल्मों में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। दिव्य ने बताया कि उनकी फीचर फिल्म ''मीरा स्पीकिंग'' जल्द रिलीज होने की तैयारी में है। उनकी डिप्लोमा फिल्म ''अंतर्द्वंद'' जर्मनी के फिल्म समारोह में चयनित हुई थी। दिव्य का कहना है कि अभिनय केवल पेशा नहीं बल्कि ऐसी कहानियों का हिस्सा बनने का सपना है, जो दर्शकों के मन में लंबे समय तक बनी रहें। इस सफर में परिवार का साथ उनकी सबसे बड़ी ताकत रहा है।
छोटे शहर से फिल्म संस्थान तक पहुंचा अभिनय का जुनून
प्रणेश कुमार
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गोरखपुर अभियान थिएटर ग्रुप से अभिनय की शुरुआत करने वाले प्राणेश कुमार ने करीब पांच वर्षों तक रंगमंच पर काम किया। बचपन से पेंटिंग में रुचि रखने वाले प्राणेश ने विश्वविद्यालय से ललित कला में स्नातक किया। इसके बाद एफटीआईआई, पुणे में चयन ने उनके अभिनय के सफर को नई दिशा दी। संस्थान में उन्हें प्रतिष्ठित कलाकारों से सीखने का अवसर मिला और अभिनय के साथ साहित्य तथा सिनेमा को समझने का मौका मिला। उन्होंने बताया कि वह कई शॉर्ट फिल्मों, म्यूजिक वीडियो और दो फीचर फिल्मों में काम कर चुके हैं। अब मुंबई में अपने अभिनय कॅरिअर को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके लिए हर नया किरदार खुद को समझने और कुछ नया सीखने का अवसर है।
इंजीनियरिंग और कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ सिनेमा की राह चुनी
सौरभ मिश्रा
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नंदानगर के सौरभ मिश्रा की कहानी जुनून के लिए अपनी राह बदलने की है। एनआईटी जमशेदपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने के बाद उन्होंने बहुराष्ट्रीय कंपनी में ब्रांड मैनेजर के रूप में काम किया। सौरभ ने बताया कि सिनेमा के प्रति उनका लगाव उन्हें लगातार इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहा। आखिरकार उन्होंने फिल्म निर्माण को अपना कॅरिअर बनाने का निर्णय लिया और एफटीआईआई, पुणे में चयनित हुए। प्रवेश परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक दो हासिल करने वाले सौरभ अब फिल्म साउंड रिकॉर्डिंग और साउंड डिजाइन सीख रहे हैं। सौरभ 10 से अधिक शॉर्ट फिल्मों और विभिन्न सांस्कृतिक विषयों पर डॉक्यूमेंट्री में काम कर चुके हैं। उनका सपना सिनेमा के माध्यम से समाज और आम लोगों की कहानियों को संवेदनशीलता से सामने लाना है।
कला की कल्पना को सिनेमा की दुनिया में दे रहे आकार
लकड़ी को आकार देकर सेट तैयार करते हर्षित गुप्ता
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बचपन से सिनेमा के प्रति लगाव रखने वाले हर्षित गुप्ता के लिए फिल्में केवल कहानियां देखने का माध्यम नहीं बल्कि एक नई दुनिया रचने का अवसर हैं। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से ललित कला में स्नातकोत्तर करने के बाद उन्होंने एफटीआईआई, पुणे में प्रोडक्शन डिजाइन का अध्ययन शुरू किया। राष्ट्रीय युवा महोत्सव में दो स्वर्ण और चार कांस्य पदक हासिल कर चुके हर्षित ने कई लघु फिल्मों में प्रोडक्शन डिजाइनर के रूप में काम किया है। निर्देशन, डॉक्यूमेंट्री सिनेमैटोग्राफी और विज्ञापन फिल्मों के अनुभव ने उनकी कला को नई दिशा दी है। उनके लिए प्रोडक्शन डिजाइन कहानी और किरदारों के अनुरूप ऐसी दुनिया रचना है, जो दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ सके।
रंगमंच के जरिए राष्ट्रीय मंचों पर बनाई पहचान
दुर्योधन के किरदार को जीवंत करते लाभांश गुप्ता।
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दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के छात्र लाभांश गुप्ता पिछले तीन वर्षों से रंगमंच से जुड़े हैं। अभिनय के प्रति रुचि ने उन्हें विश्वविद्यालय से राष्ट्रीय स्तर तक आयोजित प्रतियोगिताओं में भाग लेने का अवसर दिया। एआईयू युवा महोत्सव में जोनल और राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम एवं द्वितीय स्थान हासिल कर चुके हैं। उन्हें मार्च 2025 में राजभवन, लखनऊ में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित नाटक प्रतियोगिता में विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। उनके लिए रंगमंच अपनी प्रतिभा को पहचानने और खुद को अभिव्यक्त करने का माध्यम है। लाभांश ने बताया कि लगातार मंच पर बेहतर प्रदर्शन करने की कोशिश ही उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
रंगमंच से साहित्य तक, शब्दों में तलाश रहे अपनी पहचान
विद्यार्थी के किरदार में कुमार सुधांशु सिंह
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तारामंडल के कुमार सुधांशु सिंह ने विश्वविद्यालय में पढ़ाई के साथ रंगमंच को अपनी रचनात्मक यात्रा का हिस्सा बनाया। स्नातक के दौरान थिएटर से जुड़े सुधांशु ने विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया। साथ ही राजभवन, लखनऊ में आयोजित नाटक प्रतियोगिता में प्रथम स्थान हासिल किया। पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक के टॉपर रहे सुधांशु को दीक्षांत समारोह में स्वर्ण पदक मिला। पढ़ाई के साथ साहित्य के प्रति उनकी रुचि भी आगे बढ़ी। अगस्त 2026 में सुधांशु की कविता पुस्तक ''बस लिख दीजिए'' प्रकाशित हुई। उनके लिए रंगमंच और लेखन अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम हैं। सुधांशु का कहना है कि पढ़ाई, मंच और साहित्य के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ना उनके लिए एक नया अनुभव है।
भोजपुरी संगीत को सांस्कृतिक गरिमा के साथ आगे बढ़ाने की कोशिश
हारमोनियम पर सुरों की साधना करते आदित्य राजन।
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गायक, संगीतकार, गीतकार और रंगकर्मी आदित्य राजन पिछले दस वर्षों से अधिक समय से भोजपुरी लोकसंगीत और साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं। कबीर और गोरखनाथ की वाणी को संगीतबद्ध कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने के साथ वह भोजपुरी संगीत में नए प्रयोग कर रहे हैं। आदित्य ने बताया कि वह रंगमंच पर अभिनेता, संगीतकार और निर्देशक के रूप में काम कर चुके हैं। उन्हें संस्कृति मंत्रालय की ओर से लोक रंगमंच के क्षेत्र में जूनियर फेलोशिप मिली है। गोरखपुर में अपना ऑडियो म्यूजिक स्टूडियो संचालित करने के साथ वह फिल्मों और शॉर्ट फिल्मों में भी सक्रिय हैं। उनके लिए संगीत केवल मनोरंजन नहीं बल्कि लोकपरंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाने का माध्यम है।
लोकसंगीत के जरिए संस्कृति को नई पीढ़ी से जोड़ने का प्रयास
अपने भजनों से भक्तिमय माहौल बनातीं अनन्या सिंह।
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बिछिया की अनन्या सिंह भोजपुरी, अवधी, भजन, अर्धशास्त्रीय और सुगम संगीत के क्षेत्र में सक्रिय हैं। रामराग लोक संस्कृति संस्थान की संस्थापक अनन्या पिछले दस वर्षों से गोरखपुर मंडल और प्रदेश के विभिन्न मंचों पर प्रस्तुतियां दे रही हैं। लोकसंगीत के प्रति उनका जुड़ाव केवल मंच तक सीमित नहीं है। वह गरीब और असहाय बच्चों को निशुल्क संगीत शिक्षा देकर उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर देना चाहती हैं। उनके लिए संगीत अपनी संस्कृति और परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम है। उन्होंने बताया कि लोकसंगीत को जन-जन तक पहुंचाना और बच्चों को कला से जोड़ना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है।