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मिशन 2027 के लिए भाजपा ने क्यों चुना गोरखपुर?: तावड़े ने जाना कहां कमजोर हुई पार्टी, कौन बदल सकता है समीकरण

Tue, 22 Sep 2026 07:44 PM IST
विकास कुमार टीपी शाही, अमर उजाला, गोरखपुर

सार

विनोद तावड़े ने संगठन की मजबूती और कमजोरी पूछी। जिलों में चल रही गतिविधियों का फीडबैक लिया। पूछा कि कौन सक्रिय है और कौन निष्क्रिय। कहां कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस कर रहे हैं? कहां गुटबाजी है? कहां बड़े नेताओं के बीच मतभेद संगठन को नुकसान पहुंचा रहे हैं? दिलचस्प यह कि तावड़े ने आपसी संघर्ष में उलझे नेताओं के नाम जानने के साथ यह भी पूछा कि इनके बीच सुलह कौन करा सकता है? 
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राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों की शुरुआत भाजपा ने गोरखपुर से की। प्रदेश प्रभारी बनाए जाने के बाद राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े का पहला गोरखपुर प्रवास महज संगठन की बैठक नहीं रहा। यह जमीन को पढ़ने की कवायद थी। तावड़े ने पहले सुना। फिर सवाल किए। एक के जवाबों को दूसरे से क्रॉस चेक किया। संगठन से लेकर समाज तक फीडबैक जुटाया। संकेत साफ रहा - पहले सुनो, फिर समझो और उसके बाद रणनीति बनाओ।

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पिछले चुनावों में बदली है तस्वीर
तावड़े ने जातीय जाल में उलझे गोरखपुर क्षेत्र को शायद इसलिए चुना क्योंकि भाजपा के मजबूत प्रभाव वाले इस इलाके में पिछले चुनावों में तस्वीर बदली है। 13 लोकसभा सीटों वाले क्षेत्र में भाजपा ने 2014 में 12 सीटें जीती थी। 2019 में यह संख्या 10 हुई और 2024 में छह रह गई। विधानसभा में भी 2017 की 49 सीटों की तुलना में 2022 में भाजपा 35 सीटों पर सिमट गई। यानी 2027 की चुनौती सिर्फ सत्ता बचाने की नहीं है। पुराने गढ़ में बदले समीकरणों को समझने और उसके लिए रणनीति बनाकर पुरानी ताकत वापस हासिल करने की भी है। 

नई पीढ़ी से शुरुआत, पुराने चेहरों तक पहुंचे
तावड़े ने अपने प्रवास की शुरुआत नई पीढ़ी से संवाद के साथ की। सहजनवां के अटल आवासीय विद्यालय में विद्यार्थियों से मिले। जेन जी और जेन अल्फा की आकांक्षाएं समझने की कोशिश की। इसके बाद बातचीत का दायरा बढ़ता गया। तीन दिनों में वे संगठन के अनेक वर्तमान व पूर्व पदाधिकारियों से मिले। वर्तमान व पूर्व जनप्रतिनिधियों से मिले। समाज के अलग-अलग वर्गों के प्रमुख लोगों के साथ प्रबुद्ध वर्ग से भी मुलाकात का समय निकाला। कुछ मुलाकातें समूह में हुईं तो कुछ एकांत में। यानी एक ही सवाल के कई तरह से जवाब तलाशे गए। पूरी कोशिश यह समझने की रही कि जमीन पर वास्तव में चल क्या रहा है?

सिर्फ संगठन नहीं, संगठन के भीतर की कहानी भी
तावड़े ने संगठन की मजबूती और कमजोरी पूछी। जिलों में चल रही गतिविधियों का फीडबैक लिया। पूछा कि कौन सक्रिय है और कौन निष्क्रिय। कहां कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस कर रहे हैं? कहां गुटबाजी है? कहां बड़े नेताओं के बीच मतभेद संगठन को नुकसान पहुंचा रहे हैं? दिलचस्प यह कि तावड़े ने आपसी संघर्ष में उलझे नेताओं के नाम जानने के साथ यह भी पूछा कि इनके बीच सुलह कौन करा सकता है? यह भी जानना चाहा कि पिछले दो चुनावों में मंडल से लेकर क्षेत्र तक जिम्मेदारी संभालने वाले कौन-कौन से लोग दायित्वमुक्त होने के बाद घर बैठ गए हैं। ऐसे लोगों की सूची मांगी गई है। यह भी समझने का प्रयास किया कि किस व्यक्ति को जोड़ने से समीकरण मजबूत हो सकता है? यानी समस्या के साथ समाधान तलाशने की कोशिश भी हुई।

अमित शाह के 2014 वाले फॉर्मूले की झलक
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. अमित उपाध्याय तावड़े की इस कार्यशैली को 2014 के चुनाव के समय केंद्रीय गृहमंत्री व तत्कालीन यूपी प्रभारी अमित शाह की यूपी में आजमाई गई रणनीति से जोड़कर देखते हैं। वह बताते हैं कि तब भी संगठन के साथ नाराज और घर बैठे कार्यकर्ताओं की बात सुनी गई थी। प्रबुद्ध वर्ग और स्थानीय प्रभाव वाले लोगों से फीडबैक लिया गया था। फर्क इतना है कि तब सत्ता से बाहर थे, सरकार में आने के लिए सारा दम लगाया गया था। इस बार सत्ता में हैं और तीसरी बार जीतने की रणनीति बनाई जा रही है। लिहाजा समय के साथ प्रयोग थोड़ा वैल्यू ऐडेड है। इस बार फीडबैक का दायरा उस नई पीढ़ी तक भी पहुंचा है जो शायद इस चुनाव में वोट तो नहीं डालेगी लेकिन सोशल मीडिया के जरिए परिवार को प्रभावित जरूर करेगी। यह समझने की कोशिश हो रही है कि युवा क्या सोच रहे हैं? संगठन क्या सोच रहा है? समाज में क्या चल रहा है? और स्थानीय राजनीति किस दिशा में जा रही है? तावड़े ने इन सभी को एक साथ पढ़ने की कोशिश शुरू की है।

वरिष्ठ नेताओं की गैरमौजूदगी में खुलकर बोलने का मौका
तावड़े के प्रवास का एक अहम पहलू मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की गैरमौजूदगी भी रही। योगी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन समारोह में शामिल होने काशी चले गए थे। पंकज चौधरी गोरखपुर तब पहुंचे, जब तावड़े गोरखपुर में तीन दिन बिताकर रवाना हो चुके थे। इसे रणनीति का हिस्सा माना जाए या संयोग, लेकिन इसका एक फायदा जरूर हुआ। तावड़े के सामने स्थानीय नेताओं और पूर्व पदाधिकारियों को खुलकर बोलने का अवसर मिला। उन्होंने यह संदेश भी दिया कि कोई अकेले में मिलना चाहे तो मिल सकता है। नतीजा यह रहा कि कई लोगों ने संगठन और सरकार की कार्यशैली पर खरी-खरी सुनाई।

थाना-तहसील के साथ प्रशासनिक व्यवहार की शिकायतें
तावड़े के सामने चुनाव को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर भी बात हुई। कई मिलने वालों ने भ्रष्टाचार, महंगाई, थाना और तहसील की मुश्किलें गिनाईं। कुछ ने स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक व्यवहार को चुनावी मुद्दा बनने की आशंका बताई। यानी सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी का वास्तविक स्तर जानने की कोशिश भी इस कवायद का हिस्सा रही।

आरक्षण से लेकर पेपरलीक तक, मुद्दों की अलग-अलग परतें
तावड़े के सामने सामाजिक समीकरणों की जटिलता भी रखी गई। आरक्षण को लेकर अलग-अलग सामाजिक समूहों की चिंताएं सामने आईं। यूजीसी के नियमों को लेकर सवर्ण समाज की नाराजगी का फीडबैक मिला तो पिछड़ी और दलित जातियों में आरक्षण को लेकर चिंता बताई गई। युवाओं के बीच पेपरलीक और रोजगार का मुद्दा सामने आया। साथ ही यह फीडबैक भी मिला कि लंबे समय से सत्ता में रहने के कारण विपक्ष सरकार के खिलाफ एंटी इन्कंबेंसी का नैरेटिव तैयार कर रहा है। भ्रष्टाचार को भी उसी नैरेटिव से जोड़ रहा है। तावड़े को यह भी बताया गया कि सोशल मीडिया पर विपक्ष का हमला भाजपा के मुकाबले अधिक पैना दिखाई दे रहा है।

सियासी संतुलन पर भी ध्यान
तावड़े ने राजनीतिक संतुलन साधने पर भी ध्यान दिया। भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल से उनके आवास पर मुलाकात की। संगठन और स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा हुई। डॉ. अग्रवाल कई मौकों पर प्रशासन पर प्रोटोकॉल की अनदेखी का आरोप लगा चुके हैं। शहर के एक पुल के उद्घाटन में नहीं बुलाए जाने को लेकर उन्होंने सोशल मीडिया पर भी नाराजगी जताई थी। तावड़े का सबसे पहले उनके घर जाना चर्चा का विषय बना। अगले दिन वह गोरखनाथ मंदिर पहुंचे। गोरक्षपीठ के प्रति अपनी आस्था भी जताई। यानी संगठन के भीतर के समीकरण और गोरखपुर की राजनीतिक-सामाजिक संवेदनशीलता, दोनों को साथ साधने की कोशिश दिखाई दी।

सहयोगियों के गणित पर भी नजर
पूर्वांचल की राजनीति में सहयोगी दलों की भूमिका अलग महत्व रखती है। निषाद पार्टी अपने सामाजिक प्रभाव वाले क्षेत्रों में अधिक हिस्सेदारी चाहती है। ऐसे में सीटों का बंटवारा भाजपा के लिए अहम सवाल है। तावड़े ने कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद के घर जाकर उनसे मुलाकात की। यह मुलाकात ऐसे समय हुई जब निषाद एक कार्यकर्ता की हत्या के मामले में सरकार के खिलाफ मुखर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने सपा नेता और नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय से भी मुलाकात की थी। तावड़े ने निषाद से उनके मुद्दे और क्षेत्रीय समीकरण समझे। संकेत साफ है-भाजपा अपने सहयोगियों को सिर्फ सीटों के गणित से नहीं, सामाजिक प्रभाव के नजरिये से भी देख रही है।

हर सीट के भीतर की कहानी जानना चाहती है भाजपा
तावड़े के प्रवास से एक बात स्पष्ट हुई कि वे हर सीट की गहराई से जानकारी चाहते हैं। वे जानना चाहते हैं कि कहां संगठन कमजोर है? कहां विधायक के खिलाफ असंतोष है? कहां का जातीय समीकरण बदल रहा है तो कहां नए मतदाता निर्णायक हो सकते हैं। सहयोगी दल की भूमिका किन-किन सीटों पर कैसे अहम होगी और कहां किसी कीमत पर दबाव में नहीं आना है। यानी एक फॉर्मूला पूरे क्षेत्र पर लागू करने के बजाय सीट-दर-सीट रणनीति बनाने की तैयारी है।

नई पीढ़ी बनाम पुराना संगठनात्मक ढांचा
पुराने लोग खुद मैदान नहीं छोड़ना चाहते। यदि छोड़ने का मन भी बना रहे हैं तो परिवार को विरासत सौंपने के प्रयास में हैं। ऐसे में वर्षों से अवसर की ताक में पार्टी से जुड़कर काम कर रही नई पीढ़ी की राजनीतिक प्रतिनिधित्व की चाहत को कैसे पूरा किया जाए, यह बड़ा सवाल बना हुआ है। महिलाओं की भी राजनीति में ज्यादा भागीदारी की अपेक्षा सामने आ रही है। तीसरे दिन बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने अपनी-अपनी अपेक्षाओं व आकांक्षाओं से जुड़े पत्रक तावड़े को सौंपे। तावड़े की चुनौती पुराने नेताओं को संतुष्ट करने के साथ आम कार्यकर्ताओं व महिलाओं के लिए अवसर बनाने की भी है।

गोरखपुर का संदेश पूरे प्रदेश के लिए
तावड़े का तीन दिन का प्रवास मूलतः राजनीतिक ऑडिट जैसा रहा। संगठन की स्थिति जानी गई। कार्यकर्ताओं का मूड समझा गया। नेताओं के बीच के रिश्ते परखे गए। सहयोगियों की अपेक्षाएं सुनी गईं। जातीय समीकरणों की परतें टटोली गईं। नई पीढ़ी की आकांक्षाएं समझी गईं। सरकार और संगठन के खिलाफ असंतोष की थाह ली गई। पूरा फोकस यही समझने पर रहा कि जहां नुकसान हुआ वहां कारण क्या था? जहां जीत मिली, वहां जीत का आधार कितना टिकाऊ है? जीत के लिए आगे करना क्या-क्या है? राजनीतिक विश्लेषक प्रो. गोपाल प्रसाद कहते हैं कि इस तीन दिनी मंथन का संदेश साफ है कि 2014 की तरह सिर्फ जमीन की आवाज सुनी जाएगी, फिर उसकी परतें समझी जाएंगी और उसके बाद चुनावी रणनीति तैयार होगी। वह कहते हैं कि यह कवायद बताती है कि जीत के लिए भाजपा जो भी करना होगी, करेगी। टिकट कटने की जरूरत होगी तो कटेगी। सीट बदलने की जरूरत होगी तो बदली जाएगी। नए चेहरों पर भी खुलेमन से विचार होगा। जरूरत के हिसाब से हरेक सीट की अलग रणनीति होगी। एक तरह से तावड़े की कार्यशैली का पहला संदेश गोरखपुर से यही निकला-पहले सुनो, फिर समझो और उसके बाद रणनीति बनाओ। तावड़े एक महीने बाद फिर लौटने की बात कहकर गए हैं। यानी गोरखपुर क्षेत्र 2027 की रणनीति के लिए बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला है।

गोरखपुर क्षेत्र में भाजपा की जीत की स्थिति

लोकसभा चुनाव ( कुल 13 सीटें)
वर्ष जीती सीटें
2014 12
2019 10
2024 06

विधानसभावार स्थिति ( कुल 62 सीटें)
वर्ष जीती सीटें
2017 49
2022 35
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गोरखपुर क्षेत्र में जिलेवार सीटों का आंकड़ा
जिला विधानसभा की सीटें लोकसभा की सीटें
गोरखपुर 09 02
महराजगंज 05 01
देवरिया 07 02
कुशीनगर 07 01
बस्ती 05  01
सिद्धार्थनगर 05 01
संतकबीरनगर 03 01
मऊ 04 01
आजमगढ़ 07 02
बलिया 01 01
कुल सीटें 62 13
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