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Buddha Purnima : जहां सिद्धार्थ ने त्यागे थे राजसी वस्त्र वह कुंवरवर्ती आज भी काट रहा वनवास

Mon, 16 May 2022 09:56 AM IST
दुष्यंत शर्मा संजय कुमार पांडेय, महराजगंज

सार

भगवान बुद्ध से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल होने के बाद भी आज तक पर्यटक स्थल के रूप में नहीं हो पाया विकसित। सिद्धार्थ से बुद्ध बने भगवान गौतम बुद्ध का संदेश भले ही पूरे विश्व में फैला, लेकिन जिस कुंवरवर्ती में उन्होंने संन्यासी का वस्त्र धारण किया था, उसकी पहचान खो सी गई है। 
 
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बुद्ध पूर्णिमा - फोटो : अमर उजाला
बुद्ध पूर्णिमा। यह दिन सिर्फ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए ही नहीं, बल्कि समूचे विश्व के लिए खास है। आज के ही दिन भगवान बुद्ध अर्थात राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म हुआ। उन्हें ज्ञान भी आज ही के दिन प्राप्त हुआ और उन्होंने देह भी इसी दिन त्यागा। आज 16 मई, 2022 को बुद्ध पूर्णिमा पर हर ओर भगवान बुद्ध के उपदेश सुनाई देंगे, लोग उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लेंगे तो शासन-प्रशासन उनसे जुड़े स्थलों की तेज गति से विकास का दावा करेगा। इन सबसे इतर, महराजगंज में भगवान बुद्ध से जुड़े स्थलों की पड़ताल करें तो हकीकत कुछ और ही नजर आती है।

महराजगंज से भगवान बुद्ध का गहरा नाता रहा है। जिले में स्थित देवदह उनकी ननिहाल है तो जिले के रामग्राम में उनकी अस्थियों का आठवां हिस्सा भी मौजूद है। इसके साथ ही महत्वपूर्ण बौद्ध स्थलों में जिले में स्थित कुंवरवर्ती स्तूप का अपना अलग महत्व है। यहीं राजकुमार सिद्धार्थ ने राजसी वस्त्र त्यागे थे और संन्यासी का वेश धारण कर ज्ञान की खोज में निकल पड़े थे। बोधगया में बुद्ध पूर्णिमा के दिन ज्ञान प्राप्ति के बाद वे भगवान बुद्ध कहलाए और विश्व को शांति, सत्य और अहिंसा का संदेश दिया।
 
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Lord Buddha - फोटो : अमर उजाला।
सिद्धार्थ से बुद्ध बने भगवान गौतम बुद्ध का संदेश भले ही पूरे विश्व में फैला, लेकिन जिस कुंवरवर्ती में उन्होंने संन्यासी का वस्त्र धारण किया था, उसकी पहचान खो सी गई है। जिले और उसके आसपास के क्षेत्रों को छोड़ दें तो इसके बारे में कम ही लोग जानते हैं। आश्चर्य की बात है कि शासन-प्रशासन के दावे और वादे के बीच एक राजकुमार को संन्यासी बना दुनिया को बुद्ध देने वाला कुंवरवर्ती आज भी उपेक्षा का शिकार है। इसके महत्व को देखते हुए काफी पहले इसे एक प्रमुख बौद्ध पर्यटक स्थल के रूप में विकसित हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। देर से ही सही, अब प्रशासन ने मामले को संज्ञान में लिया है। भगवान बुद्ध से जुड़े जिले के स्थलों के विकास की रूपरेखा तैयार की गई है।

कुंवरवर्ती स्तूप आज ‘कुंवर बाती का स्थान’ के नाम से जाना जाता है, जो महराजगंज से चिउटहा होते हुए सिसवा बाजार जाने वाले मार्ग पर स्थित है। यहां वह पोखर भी मौजूद है, जिसमें स्नान कर भगवान बुद्ध ने अपने राजसी वस्त्र उतारे थे। हां, उस पोखरे में अब पानी काम कम रहता है।  संवाद

 
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buddha statue - फोटो : istock
देवदह : भगवान बुद्ध का ननिहाल भी है उपेक्षित
भगवान बुद्ध का ननिहाल देवदह महराजगंज में ही है। यह बुद्ध की माता महामाया, मौसी महाप्रजापति गौतमी के साथ ही उनकी पत्नी यशोधरा की भी जन्मभूमि है, जो नौतनवां तहसील के बनरसिया कला और बनरसिया खुर्द में स्थित है। 1978 में पुरातत्व विभाग ने यहां 88.8 एकड़ भूमि संरक्षित कर किसी भी प्रकार के निर्माण और खनन पर रोक लगा दी थी। अब टीले के नाम पर मात्र 1.04 एकड़ जमीन बची है। देवदह भले ही बुद्ध की जननी की जन्मभूमि है, यहां उनके बचपन का काफी समय बीता था। भगवान बुद्ध के जन्म के कुछ दिन बाद ही उनकी माता का निधन हो गया और उनका पालन पोषण उनकी मौसी ने किया। इस दौरान बुद्ध के बचपन का लंबा समय देवदह में बीता। डॉ. परशुराम गुप्त द्वारा लिखित पुस्तक ‘जनपद महराजगंज के बौद्ध स्थल देवदह- रामग्राम-कुंवरवर्ती स्तूप’ में जिले के भगवान बुद्ध से जुड़े स्थलों का विस्तार से वर्णन किया गया है।    

 

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lord buddha - फोटो : अमर उजाला।
रामग्राम : जहां मौजूद है बुद्ध की अस्थियों का सबसे बड़ा हिस्सा
इतिहासकारों के अनुसार, भगवान के कुशीनगर में निर्वाण प्राप्त करने के बाद उनके अनुयायी राजा वहां पहुंचे गए। बुद्ध की अस्थियों को अपने साथ ले जाने की बात पर उनके बीच तनाव की स्थिति पैदा हो गई। इसी दौरान किसी ने सुझाया कि अस्थियों को आठ हिस्सों में बांट कर हर किसी को एक-एक हिस्सा सौंप दिया जाए। अस्थियों के आठवें हिस्सें को कोलिय वंश के राजा महाकाल अपने साथ ले आए और रामग्राम में उसके ऊपर धातु स्तूप का निर्माण कराया। कुषाण व गुप्त कालखंड में इसे विस्तृत आकार दिया गया।

बाद में बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद सम्राट अशोक ने बुद्ध की अस्थियों के सात हिस्सों को निकवाकर सैकड़ों हिस्सों में बांटा और देश-दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भेजवाकर बौद्ध धर्म का प्रचार किया। कहा जाता है कि सम्राट अशोक अस्थियों के लिए रामग्राम भी पहुंचा था, लेकिन यहां जंगली जानवरों को अस्थि स्तूप की परिक्रमा करते देख वह आश्चर्यचकित रह गया और अस्थियों का कुछ हिस्सा यहां से निकलवाने का विचार त्याग दिया। ऐसे में रामग्राम स्तूप ही वह स्थान है, जहां भगवान बुद्ध की अस्थियों के आठ हिस्सों में से एक हिस्सा पूरी तरह सुरक्षित है।

सम्राट हर्षवर्द्धन के शासन काल में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने महत्वपूर्ण बौद्ध स्थलों का भ्रमण किया था। इस क्रम में वह देवदह भी आया। 1991 में पुरातत्विक सर्वेक्षण विभाग की पटना इकाई ने यहां खनन कराया था। रिपोर्ट में टीम ने स्तूप को गुप्त काल से पहले का बताया था। इस बातों का जिक्र मेरी पुस्तक ‘जनपद महराजगंज के बौद्ध स्थल देवदह- रामग्राम-कुंवरवर्ती स्तूप’ में है। मौजूदा सांसद पंकज चौधरी जिले के बौद्ध स्थलों के विकास का मुद्दा संसद में उठा चुके हैं। उम्मीद है जल्द ही जिले को बौद्ध भूमि के रूप में दुनिया में नई पहचान मिलेगी।
डॉ. परशुराम गुप्त, पूर्व विभागाध्यक्ष, सैन्य विज्ञान (जवाहर लाल नेहरू पीजी कॉलेज)

बनर्सिहा कला में गौतम बुद्ध की ननिहाल देवदह और चौक बाजार के रामग्राम में गौतम बुद्ध के अस्थियों के आठवें हिस्से पर बने पवित्र स्तूप को सीधे सड़क मार्ग से जोड़कर विदेशी पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकता है। बौद्ध परिपथ से इन दोनों पवित्र बौद्ध स्थलों को जोड़ने से जनपद का सर्वाधिक विकास होगा।
- जितेंद्र राव, अध्यक्ष, देवदह रामग्राम बौद्ध विकास समिति

 
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Lord Buddha Mahaparinirvana - फोटो : अमर उजाला।
देवदह में अब तक ये कार्य हुए
  • राजमहल (ढाई एकड़) अवशेष को तारबाड़ से घेरकर सुरक्षित किया गया है
  • राजमहल से मुख्य टीले तक 400 मीटर लंबा और 15 फीट चौड़ा कच्चा मार्ग
  • देवदह में मुख्य आकर्षण का केंद्र पुषकर्णी (सगरा) का जीर्णोद्धार किया जा रहा है
  • पेयजल के लिए तीन इंडिया मार्का हैंडपंप और 8 सोलर लाइटें लगाई गई हैं
फाह्यान ने भी किया है उल्लेख
चीनी यात्री फाह्यान ने अपने यात्रा विवरण में भगवान बुद्ध से जुड़े स्थलों की दूरियों का उल्लेख योजन में किया है। कनिंघम की गणनानुसार फाह्यान का एक योजन 6.71 मील के बराबर था। कपिलवस्तु से बर्डपुर, मोहाना, लोटन, कोल्हुई व एकसड़वा होते हुए लक्ष्मीपुर ब्लॉक स्थित बनरसिया (देवदह)की दूरी 53 किमी पूरब है। इसी प्रकार कपिलवस्तु से लुंबिनी, केवटलिया, बेतकुइयां, महदेवा (नेपाल), जोगियाबारी व एकसड़वा होते हुए बनरसिया की दूरी भी लगभग इतनी ही है। चीनी यात्री फाह्यान व ह्वेनसांग ने देवदह की दिशा कपिलवस्तु के पूरब बताई है। इस प्रकार दिशा और दूरी के आधार पर बनरसिया स्तूप ही देवदह साबित हुआ है। 
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