केस एक
07 सितंबर 2021:चिलुआताल थाना क्षेत्र का छह वर्षीय अंकित को मां ने बंदर से डरा दिया था। इसके बाद वह घर से निकल गया था। करीब दो घंटे बाद घरवालों ने उसकी तलाश शुरू की और फिर पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने घंटों तलाश के बाद उसे गोरखनाथ के पास से बरामद किया था। सीसी टीवी कैमरे की मदद से बच्चे को पुलिस ने जाते देखा था, जिसके बाद वह मिला था। दरअसल, बच्चा घर से निकलने के बाद भटक गया था और रास्ता न पाने की वजह से गोरखनाथ की ओर चला गया था।
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केस दो
08 अक्तूबर 2022: कैंट इलाके का रहने वाला दस वर्षीय अर्जुन मां की डांट से नाराज होकर रेलवे स्टेशन पहुंच गया था। मां ने उसे पढ़ाई न करने पर पिता से शिकायत करने का डर दिखाया था। इसके बाद वह घर से निकल गया था। पुलिस तत्काल सक्रिय हुई तो आरपीएफ की मदद से एक ट्रेन के डिब्बे से उतारा था। पुलिस से तब उसने बताया था कि वह दिल्ली जाने के लिए रेलवे स्टेशन आया था।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग प्रो. धनंजय ने कहा कि बचपन में हर किसी को किसी न किसी बात से डर लगता है। किसी को छिपकली तो किसी को ऊंचाई से। इसे फोबिया कहा जाता है। अक्सर घर वाले बच्चे जिस बात से डरते हैं, उसी का इस्तेमाल कर डराते हैं। ताकि, बच्चा उस काम को न करें। लेकिन, इसका बच्चे के दिमाग पर दुष्प्रभाव पड़ता है और फिर वह उसके दिमाग में घर कर जाता है। इसे ट्रामा कहा जाता है। इस स्थिति में आने के बाद बच्चा किसी भी हद तक जा सकता है। यह संयोग अच्छा है कि बच्चे ने घर में खुद को बंद किया, नहीं तो कई बार ट्रामा के मरीज छत से कूदने जैसी वारदात को भी कर देते हैं।
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गोरखपुर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग डॉ. मनीष पांडेय ने कहा कि समाज में सामान्य रूप से असहनशीलता बढ़ी है, जिसका प्रभाव बच्चों पर भी दिख रहा है। छोटे बच्चे भी असामान्य रूप से प्रतिक्रियावादी हो रहे हैं। परिवार का स्वरूप एकल होने से वे कई प्रकार की सहानुभूति से वंचित हैं। बच्चे में दुख और डर को समझना और पहचानना अभिभावक के लिए मुश्किल भरा हो गया है। हर बच्चा अपनी उम्र के हिसाब से ट्रामा पर अलग तरह से रिएक्ट करता है और यहीं पर परिवार की भूमिका और समाजीकरण कमजोर होने से समस्याएं खड़ी हो रही हैं।