आरएमआरसी के मीडिया प्रभारी डॉ अशोक कुमार पांडेय ने बताया कि सबसे महत्वपूर्ण नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग (एनजीएस) मशीन जर्मनी से आनी है। इसी मशीन से वायरस के नए वैरिएंट का पता लगाया जाता है। यह मशीन अब तक नहीं मिली है। इसके अलावा साइटोकाइन मशीन है, जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का पता लगाती है। फ्लो क्यटोमैट्री मशीन, जो कोशिकाओं की जांच कर बीमारियों का पता लगाती है, यह मशीनें भी अब तक नहीं मिली हैं। इन मशीनों को आने में कम से कम दो माह का समय लगेगा। इसके बाद ही लैब में जांचें शुरू हो पाएंगी।
यह लैब बनाई गई है....
इम्यूनोलॉजी: वैक्सीन की प्रतिरोधक क्षमता तथा उसके प्रभाव पर शोध होंगे।
मॉलिक्यूलर बायोलॉजी: जीनोम सिक्वेंसिंग की जा सकेगी। अभी जीन सीक्वेसिंग के लिए नमूने दिल्ली और पुणे भेजे जाते हैं।
माइकोलॉजी: फंगल की जांच सहित शोध हो सकेगा।
मेडिकल इंटोमोलॉजी: डेंगू, चिकनगुनिया, इंसेफ्लाइटिस आदि के वाहक कीटों पर शोध होगा।
नॉन कम्युनिकेबल डिजीज: मधुमेह व हाइपरटेंशन के कारणों की जांच की जाएगी।
माइक्रोबायोलॉजी: वायरस और वैक्टीरिया पर शोध होंगे।
सोशल बिहेवियर स्टडी: मानसिक बीमारियों पर शोध किया जाएगा।
हेल्थ कम्युनिकेशन: बीमारियों की रोकथाम के उपायों के प्रचार-प्रसार का प्रमुख जरिया।
इंटरनेशनल हेल्थ पॉलिसी: इसके जरिए विश्व स्तर की होने वाली बीमारियों के बारे में लोगों को बताया जाएगा।
आरएमआरसी मीडिया प्रभारी डॉ. अशोक कुमार पांडेय ने कहा कि लैब बनकर तैयार हो चुका है। अब केवल मशीनें आनी बाकी हैं। सभी मशीनें अमेरिका और जर्मनी से आनी हैं। इसलिए थोड़ी देरी हो रही है। इसके अलावा पांच पंजिला भवन पर कुछ काम अधूरे रह गए हैं। उस पर भी तेजी से काम हो रहा है।