Vinod Upadhyay Gorakhpur: गोरखपुर और बस्ती मंडल में आतंक का पर्याय बने माफिया विनोद उपाध्याय को शुक्रवार तड़के एसटीएफ ने मुठभेड़ में मार गिराया। विनोद ने राजनीति में भी हाथ आजमाया था। वह बसपा में गया तो दो बार टिकट बदलने के बाद चुनाव लड़ा। माफिया विनोद ने विधायक के जरिए बसपा में पैठ बनाई थी।
छात्रसंघ चुनाव में दखल के साथ ही विनोद ने विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी भी शुरू कर दी थी। इसके लिए वह एक उभरते नेता के संपर्क में आया, जो बसपा से सहजनवां विधानसभा क्षेत्र से विधायक भी हुए थे। उनके जरिए ही उसकी मुलाकात बसपा के बड़े नेताओं से हुई थी।
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शहर विधानसभा क्षेत्र से 2007 में दो बार टिकट बदलने के बाद वह चुनाव लड़ा, लेकिन हार गया। दरअसल, बसपा की ओर से जब उसे टिकट मिला, तभी वह जेल भेज दिया गया। नामांकन के समय जेल से जमानत में दुविधा होने पर उसने भाई जयप्रकाश उपाध्याय को टिकट दिलवा दिया, लेकिन नामांकन के समय ही उसे जमानत मिल गई।
फिर उसने भाई का नाम बदलवाकर खुद टिकट लिया और चुनाव मैदान में उतरा। तब मायावती सहित कई बड़े नेताओं ने उसके लिए सभा भी की थी। वह चुनाव हार गया और चौथे नंबर पर रहा। इसके कुछ दिनों बाद ही शाहपुर थाने के कौवाबाग पुलिस चौकी के पुलिसकर्मियों से विनोद के भाइयों का विवाद हो गया।
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इस मामले में विनोद ने ना सिर्फ पुलिसवालों से मारपीट की, बल्कि थाने पहुंचकर उनसे निपट लेने की धमकी भी दी। इस मामले में विनोद और उसके भाइयों पर केस भी दर्ज हुआ। मामला राजनीतिक रंग लेने लगा तो विनोद को बसपा से बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद दोबारा विनोद कभी राजनीति में इंट्री नहीं ले सका।
नए लड़कों के समर्थन से बना ली गैंग
यूनिवर्सिटी से करीब 10 साल जुड़े रहने के कारण विनोद ने छात्रों की एक बड़ी गैंग बना ली। विनोद के गिरोह में नए लड़के आते और जाते थे। बताया जाता है कि वह नए लड़कों को गिरोह में लाता था, लेकिन उसकी रुपयों से मदद नहीं करता था, इस वजह से बहुत दिन तक उसके गिरोह में कोई नहीं रहता था।
माफिया विनोद उपाध्याय को एसटीएफ ने किया ढेर
आपको बता दें कि गोरखपुर व बस्ती मंडल में आतंक का पर्याय बने माफिया विनोद उपाध्याय को एसटीएफ ने मुठभेड़ में मार गिराया। सुल्तानपुर के कोतवाली देहात थाना क्षेत्र के हनुमानगंज में बाईपास के पास शुक्रवार तड़के साढ़े तीन बजे एसटीएफ से बचने के लिए उसने फायरिंग कर दी। जवाबी कार्रवाई में वह घायल हो गया। मेडिकल कॉलेज में चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। विनोद प्रदेश के टॉप-61 माफिया की सूची में शामिल था, उसके पास से कारबाइन, पिस्टल, कारतूस व कार बरामद हुई है।
मूलरूप से अयोध्या के महाराजगंज थाना क्षेत्र के उपाध्याय का पुरवा निवासी विनोद गोरखपुर के रेल विहार कॉलोनी, शाहपुर और धर्मशाला बाजार क्षेत्र में रहता था। उसके खिलाफ गोरखपुर, बस्ती और लखनऊ में चार हत्याओं, हत्या के प्रयास व रंगदारी सहित 45 केस दर्ज हैं। वह 2007 में बसपा के टिकट पर गोरखपुर शहर क्षेत्र से विधानसभा चुनाव भी लड़ चुका था जिसमें उसे करारी हार मिली थी।
शासन स्तर से जारी टॉप-61 माफिया की सूची में शामिल ज्यादातर बदमाश सरेंडर कर चुके हैं, वहीं विनोद उपाध्याय को पुलिस तलाश रही थी। बृहस्पतिवार को लखनऊ एसटीएफ पुलिस उपाधीक्षक दीपक कुमार सिंह के नेतृत्व में सुल्तानपुर पहुंची। सूचना मिली थी कि विनोद कोतवाली देहात क्षेत्र में किसी से मिलने आ रहा है। एसटीएफ ने कोतवाली देहात थाने की मदद से हनुमानगंज बाईपास के पास घेराबंदी की।
शुक्रवार तड़के लखनऊ की ओर से आती कार में सवार विनोद को एसटीएफ ने रोकने का प्रयास किया तो वह बाईपास की तरफ भागने लगा। करीब तीन किमी. आगे जाकर सर्विस लेन के पत्थर से टकराकर उसकी कार रुक गई। विनोद ने मिट्टी के टीले का सहारा लेकर फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी फायरिंग में उसे तीन गोलियां लगीं। एसटीएफ ने कोतवाली देहात थाने में विनोद के खिलाफ जानलेवा हमले और आर्म्स एक्ट के तहत केस दर्ज कराया।
जेल में थप्पड़ खाने के बाद बना माफिया
विनोद उपाध्याय पहले गोरखपुर में ऑटो चलवाता था। उसने पिता के सूदखोरी के धंधे में भी हाथ आजमाया। ऑटो स्टैंड के विवाद में पहली बार 1999 में जेल गया। वहां से निकला तो ठेकेदारी में पांव जमाने की कोशिश करने लगा। 2004 में विनोद फिर एक मामले में जेल गया तो वहां नेपाल के बदमाश जीत नारायण मिश्र ने खाने के विवाद में उसे थप्पड़ मार दिया।
2005 में इसका बदला विनोद ने लिया। कार से लखनऊ जा रहे जीत नारायण मिश्रा और उसके बहनोई गोरेलाल को संतकबीरनगर जिले के बखिरा में गोली मारकर हत्या कर दी। यह विनोद के माफिया बनने का पहला कदम था। वह नेपाल से फर्जी वीजा पर विदेश भी गया था।