कर्फ्यू के दौरान प्रेस वार्ता करते प्रवीण तोगड़िया।
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रामजन्म भूमि आंदोलन के दौरान गोरखपुर पूरे देश के लिए प्रमुख केंद्र था। उस दौरान विश्व हिंदू परिषद का कार्यालय भी गोरखनाथ मंदिर में था और तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ ने साधु-संतों को एक मंच पर लाकर आंदोलन का दायरा बढ़ा दिया था। उसी दौरान बजरंग दल के शिविर में हर महीने प्रवीण तोगड़िया आते थे। युवा टीम को आत्मरक्षा की ट्रेनिंग के साथ में त्रिशुल दिया जाता था।
बजरंग दल के पूर्व महानगर संयोजक अतुल भट्ट बताते हैं, प्रवीण तोगड़िया, विष्णु हरि डालमिया, अशोक सिंघल और आचार्य गिरिराज किशोर का प्रवास हमेशा गोरखपुर में लगता था। आसपास के इलाकों में शिविर लगाते थे।
एक बार प्रवीण तोगड़ियां का प्रशिक्षा शिविर लगा था। मेरा परिचय हुआ। उस समय मेरी उम्र 17 से 18 वर्ष थी। बोले, तुम तो बजरंगी लगते हो। उन्होंने मुझे एक छह इंच से छोटा त्रिशूल दिया और कहा कि यह पूजा के साथ ही रक्षा के लिए भी है। शहर में युवाओं की कई टोलियां तैयार की गई। इसके अलावा शिविर में एयरगन से निशाना लगाना, तलवार चलाना, रस्सी खींचने की भी ट्रेनिंग दी जाती थी।
कानपुर से आता था त्रिशूल
बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को देने के लिए त्रिशूल कानपुर से आता था। बजरंग दल के तत्कालीन राष्ट्रीय संयोजक प्रकाश शर्मा ने इसकी व्यवस्था संभाल रखा था। त्रिशुल को हम लोग कमर में खोसकर चलते थे। उस समय बाल कृष्ण सराफ, महानगर उपाध्यक्ष राधेश्याम पालीवाल, कैलाश सराफ, गोविंद खरे और अजीत सरिया सहित कई सारे लोग आर्थिक व्यवस्था संभालते थे। सबसे मुश्किल काम था जब कर्फ्यू वाले क्षेत्र के लोगों को शिविर में भाग लेने में दिक्कत होती थी। हम लोग छात्र बताकर किसी तरह पहुंचते थे।
1977 में राजनीति से अलग हो गए थे महंत अवेद्यनाथ
महंत अवेद्यनाथ 1977 में विधायक बनने के बाद राजनीति से अलग हो गए थे। 1989 में रामजन्म भूमि आंदोलन जब तेज हुआ तो संतों के आग्रह पर सांसद का चुनाव लड़े। लगातार तीन बार संसद में प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद फिर उनके शिष्य योगी आदित्यनाथ ने सदर लोकसभा की कमान संभाली और लगातार पांच बार सांसद चुने गए।