तिवारीपुर को सतासी राजा होरी सिंह उर्फ मंगल सिंह ने 13वीं सदी की शुरुआत में बसाया। भौवापार में रहकर सतासी राजा ने तिवारीपुर को कैसे बसाया, इस सवाल का जवाब तलाशने के क्रम में पता चला सतासी राजा विश्राम सिंह जो नि:संतान थे, उन्होंने अपने कुल को आगे बढ़ाने के लिए उनवल के होरी सिंह उर्फ मंगल सिंह को गोद लिया।
महानगर का मोहल्ला तिवारीपुर, नाम से हर किसी को ऐसा लगता होगा कि इसका इतिहास बहुत पुराना नहीं होगा। लेकिन, जानकर आश्चर्य होगा कि यह मोहल्ला एक-दो नहीं बल्कि सात सौ वर्ष पहले बसा था।
विज्ञापन
तिवारीपुर को सतासी राजा होरी सिंह उर्फ मंगल सिंह ने 13वीं सदी की शुरुआत में बसाया। भौवापार में रहकर सतासी राजा ने तिवारीपुर को कैसे बसाया, इस सवाल का जवाब तलाशने के क्रम में पता चला सतासी राजा विश्राम सिंह जो नि:संतान थे, उन्होंने अपने कुल को आगे बढ़ाने के लिए उनवल के होरी सिंह उर्फ मंगल सिंह को गोद लिया।
होरी सिंह ने जब राजपाट संभाला तो उनके राजवंश के अन्य लोगों की ओर से कड़ा विरोध होने लगा। विरोध से बचने के लिए होरी सिंह ने गोरखनाथ मंदिर के पास बाबा गोरक्षनाथ के नाम पर गोरखपुर कस्बा बसाया और वहीं से रहकर शासन करने लगे।
विज्ञापन
इसी दौरान उन्होंने शासन कार्य की सहूलियत के लिए अपने कुलगुरु यानी सोहगौरा के कुछ तिवारी परिवार को आज के तिवारीपुर क्षेत्र की जागीर देकर बसा दिया। तिवारी लोग जब वहां बसे तो क्षेत्र का दायरा बढ़ने लगा और बहुत से और लोगों ने अपनी आशियाना वहां बना लिया। देखते ही देखते इलाके ने बस्ती का रूप ले लिया और अब यहां घनी आबादी है।
चूंकि बसावट के मूल में तिवारी परिवार था, सो पूरी बस्ती का नाम तिवारीपुर पड़ गया, जिसे आज हम एक घने बसे मोहल्ले के रूप में जानते हैं। मोहल्ले की बेतरतीब बसावट उसके प्राचीन होने की तस्दीक है। मोहल्ले की विशिष्टता और अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां शासन व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए बाकायदा थाना स्थापित है।