पशु चिकित्साधिकारी डॉ. संजय कुमार ने कहा कि गर्मी ज्यादा पड़ रही है। इसकी वजह से कुत्तों के व्यवहार में बदलाव आया है। ऐसे मौसम में कुत्ते ज्यादा आक्रामक हो जाते हैं। क्योंकि, कुत्तोंं के दिमाग में थर्माे रेगलेट्री सिस्टम नहीं होता है। यही कारण है कि अपनी गर्मी को शांत करने के लिए जीभ निकालकर हांफते हैं। इससे महज 10 से 15 प्रतिशत ही गर्मी निकल पाती है। गर्मी के चलते उनमें चिड़चिड़पन आ जाता है। जरा भी आवाज सुनने पर आक्रामक होकर लोगों को काट लेते हैं।
दूसरी बड़ी वजह यह भी है कि इनके रहने की जगह भी कम होती जा रही है। हर तरफ मकान बन गए हैं और जो जगह बच रही है वहां गाड़ियों का कब्जा हो गया है। जिसकी वजह से इन्हें डर है कि एक दिन इस स्थान से भी भगा दिए जाएंगे। एक और कारण है, पहले घरों के आसपास इन्हें खाने के लिए पर्याप्त मात्रा में जूठन मिल जाता था। सफाई को लेकर लोग जागरूक हुए तो अब खाने को भी नहीं मिल पा रहा है। खाली पेट होने के चलते भी गुस्सा बढ़ा है।
जिला अस्पताल के अधीक्षक डॉ. अंबुज श्रीवास्तव ने बताया कि कुत्ते ज्यादा आक्रामक हो गए हैं। शहरी क्षेत्रों से मरीज ज्यादा आ रहे हैं। प्रतिदिन 100 से 120 मरीजों को एंटी रेबीज वैक्सीन लगाई जा रही है। प्रतिदिन 22 से 25 एंटी रेबीज वैक्सीन के वायल की खपत है। एक वायल में चार लोगों को वैक्सीन लगाई जाती है।
एआरवी न लगवाने वाले जान पर खेल रहे
डॉ. अंबुज श्रीवास्तव ने बताया कि मरीज अगर एआरवी नहीं लगवाते हैं, तो जान जोखिम में डाल रहे हैं। कुत्तों के काटने का तत्काल प्रभाव नहीं पड़ता है। जैसे-जैसे समय बीतता है वैसे-वैसे शरीर में संक्रमण बढ़ता जाता है। ऐसे में मरीज के शरीर में क्या परिवर्तन हो जाए, यह किसी को नहीं पता। इसलिए कुत्ते, बंदर और इंसान के काटने पर भी एआरवी जरूर लगवाएं।
हाई डोज एंटी रैबीज वैक्सीन का संकट
जिन लोगों को कुत्ते गंभीर रूप से काट लेते हैं, उन्हें हाई डोज एंटी रेबीज वैक्सीन लगाई जाती है। यह इंजेक्शन कंधे के बजाए मरीज के जख्म पर लगाया जाता है। हाईडोज रेबीज वैक्सीन जिला अस्पताल को छोड़कर बीआरडी में उपलब्ध है। लेकिन, यहां भी जुगाड़ वालों को ही यह वैक्सीन लगाई जाती है। वहीं, निजी अस्पतालों में इस वैक्सीन को लगवाने के लिए लोगों को दो हजार से तीन हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं। जबकि, इससे पीड़ित 10 से 15 मरीज रोज जिला अस्पताल में वैक्सीन लगवाने पहुंच रहे हैं।
डॉ. संजय कुमार के मुताबिक शहर में जो लोग कुत्ते को पाल रहे हैं। उन्हें रहने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं मिल पा रहा है। इसके चलते वह ज्यादा चिड़चिड़े हो जाते हैं। इनमें सबसे अधिक दिक्कत रॉट विलर,पिट बुल और बुलडाग और पाकिस्तानी बुल्ली प्रजाति के कुत्ते शामिल हैं। इन्हें ज्यादा स्थान चाहिए खुद को खेलने के लिए। लेकिन, लोग दो कमरे में रहकर उन्हें भी उसमें ही रख रहे हैं।
एक सप्ताह में एआरवी लगवाने पहुंचे मरीज
28 जून- 105- बच्चे- 28
29 जून- 101- बच्चे-26
30 जून- 106- बच्चे-31
एक जुलाई - 103- बच्चे- 26
दो जुलाई- 118- बच्चे- 36
तीन जुलाई- 104- बच्चे- 23
चार जुलाई- 103- बच्चे-27
पांच जुलाई- 102- बच्चे-28