रिटायर्ड कैप्टन आद्या प्रसाद दुबे के ट्रेनिंग सेंटर में सेना के लिए तैयार होते हैं जवान।
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मातृभूमि के प्रति जज्बा और एक अच्छा शिक्षक होना कोई सेना के रिटायर्ड कैप्टन आद्या प्रसाद दुबे से सीखे। कैप्टन ने सेना में रहते हुए देश की सीमा पर दुश्मनों को सबक सिखाया और अब गांव में रहकर युवाओं को सेना में कैसे भर्ती हो इसका सबक सिखा रहे हैं। बीते 28 वर्ष में ट्रेनिंग देकर उन्होंने सेना के विभिन्न आयामों के लिए तीन हजार से अधिक युवाओं को तैयार किया है। अपने गांव के कुछ अराजक युवाओं को ट्रेनिंग देने से शुरू हुए इस सफर में अब कई राज्यों के युवा जुड़ चुके हैं, ट्रेनिंग का यह सिलसिला जारी है। आद्या प्रसाद बताते हैं कि 1992 में वह सेना से कैप्टन पद से रिटायर होकर अपने गांव चौरीचौरा के मिठाबेल लौटे थे। गांव पहुंचे ही थे कि पता चला कि एक युवक ने महज पांच सौ रुपये लूटने के इरादे से एक मजदूर की गोली मार कर हत्या कर दी है। गांव में घूमे तो अधिकतर युवक भटके हुए और अराजक कार्यों में लिप्त मिले। उन्होंने ऐसे युवाओं को अनुशासन सिखाने की ठान ली। गांव के पांच लड़कों को सेना में भर्ती देने की ट्रेनिंग शुरू की। पहले वर्ष एक लड़के का चयन सेना में हुआ।
इसका असर यह हुआ कि क्षेत्र के बेरोजगार युवा आकर्षित हुए और उनसे जुड़ते चले गए। युवाओं की संख्या बढ़ी तो उन्होंने सहसरांव में भी एक ट्रेनिंग सेंटर शुरू किया। बीते 28 वर्ष में उनके ट्रेनिंग सेंटर से निकले तीन हजार से अधिक युवा सेना, जल सेना, एनडीए, वायुसेना के साथ विभिन्न प्रदेशों की पुलिस में देश की सेवा कर रहे हैं। आद्या प्रसाद दुबे कहते हैं कि निशुल्क ट्रेनिंग सेंटर में वह युवाओं से शुल्क के रूप में बस अनुशासन, लगन और मेहनत की मांग करते हैं।