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ताल सुमेर सागर : जिम्मेदार ताकते रहे, रसूखदार बेचते रहे जमीन, होता रहा निर्माण

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ताल सुमेर सागर : जिम्मेदार ताकते रहे, रसूखदार बेचते रहे जमीन, होता रहा निर्माण
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गोरखपुर। ताल सुमेर सागर और नजूल की जमीन प्लाटिंग कर बेचने और वहां अवैध निर्माण के मुख्य सूत्रधार प्रशासन की पहुंच से अभी भी दूर हैं, मगर आम जनता सबसे पहले कार्रवाई की शिकार हो गई। मौके पर कई लोगों का आसरा छिन गया तो कुछ का छिनने वाला है। कुछ की तो जिंदगी भर की कमाई ही डूब गई।
जानकारी के मुताबिक ताल की जमीन कई लोगों को गुमराह कर बैनामा कराने के खेल के पीछे गोरखपुर से नासिक में जाकर बसे एक रसूखदार का हाथ है। शहर के ही एक बड़े बिल्डर की मदद से इस रसूखदार ने ब्रोकर की भूमिका निभाई और मूल खातेदार से 14 लोगों को जमीन बैनामा करा दी। ताल की जमीन कब्जा होने के लिए ये रसूखदार या फिर वर्तमान में जिन्होंने वहां घर बनवा लिया वे ही नहीं राजस्व, जीडीए और नगर निगम के भी तत्कालीन अफसर-कर्मचारी बराबर के जिम्मेदार हैं। मगर ये सभी मौज काट रहे हैं।
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ताल की जमीन पर हुए निर्माण में दो मकानों का जीडीए ने मानचित्र स्वीकृत किया है। नगर निगम ने वहां करीब एक दशक पहले सड़क बनवाई थी, जिसका सांसद रहते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से शिलान्यास कराया गया था। करीब 14 लोगों का बैनामा हुआ और खारिज-दाखिल की भी प्रक्रिया पूरी की गई तो फिर राजस्व विभाग क्या कर रहा था ? ऐसे बहुत से सवाल हैं जो यह दर्शाते हैं कि ताल सुमेर सागर की जमीन का वजूद खत्म कर वहां हुए अवैध निर्माण के लिए जितना आम आदमी जिम्मेदार है उतना ही जीडीए, नगर निगम और राजस्व विभाग के तत्कालीन अधिकारी-कर्मचारी फिर कार्रवाई उनपर क्यों नहीं हो रही ?
ऐसे हुआ जमीन पर कब्जे का खेल
प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक राजस्व अभिलेखों में सुमेर सागर ताल के कुछ गाटा संख्या की जमीन निजी खातेदारों के तौर पर शहर के सिनेमा रोड स्थित बंद हो चुके एक सिनेमा हाल के मालिक, अलीनगर की एक ज्वेलरी दुकान के मालिक और सिद्धार्थनगर की बांसी तहसील के पुराने संपन्न लोगों के नाम दर्ज थी। राजस्व कर्मचारियों की मिलीभगत से एक व्यवसायी और बिल्डर ने इन सभी खातेदारों को जमीनें बेचने के लिए राजी करा लिया और फिर खरीदार की तलाश शुरू हुई। कई को जमीनें बेचकर इन सभी ने मोटी कमाई की और फंस गए जमीन लेने वाले। अब उनका कहना है कि उन्होंने जिनसे जमीन खरीदी, दस्तावेज पर वे ही खेवटदार (जमीन मालिक) थे। बैनामे के समय राजस्व के 12 साल पुराने रिकार्ड में भी संबंधित जमीन भूमिधरी की ही थी। पूर्व डीएम डॉ. हरिओम की ओर से भी ताल की जमीन की कराई गई, जांच रिपोर्ट में भी गाटा संख्या 1002, 736, 737 और 839 को प्राइवेट लैंड बताया गया था। हालांकि प्रशासन का कहना है कि भले ही ताल की कुछ जमीन प्राइवेट लैंड है, मगर उसकी नवैयत (स्वरूप) जलमग्न है।
नक्शा पास करने, सड़क बनाने की भी होगी जांच
ज्वाइंट मजिस्ट्रेट गौरव सिंह सोगरवाल का कहना है कि ताल की जमीन से अवैध कब्जा हटाने के साथ ही इसकी भी अब जांच शुरू कर दी गई है कि वहां कॉलोनी कैसे बसा दी गई ? जमीन बेचने वाले मुख्य विक्रेता कौन थे ? यहीं नहीं मौके पर जो कुछ मकानों के मानचित्र स्वीकृत किए गए हैं, उसके साथ ही इस बात की भी जांच की जा रही है कि नगर निगम ने वहां सड़क कैसे बनवा दी, जबकि वह ताल की जमीन थी। सड़क किसने स्वीकृत की ? कितनी लागत से बनी यह सब जांच के दायरे में है। कहा कि राजस्व विभाग की भी भूमिका जांची जा रही है। पता लगाया जा रहा है कि कैसे जमीन बैनामा की गई और उसका नामांतरण कैसे कर दिया गया ? किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। नगर निगम और जीडीए के मामले में कार्रवाई के लिए कमिश्नर को रिपोर्ट भेजी जाएगी।
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सात दिन में मकान खाली करने का अल्टीमेटम
गोरखपुर। सुमेर सागर ताल के पास निर्माण करा चुके कुछ लोगों ने कांग्रेस नेता राणा राहुल सिंह के नेतृत्व में मंगलवार को ज्वाइंट मजिस्ट्रेट से मुलाकात कर अपना पक्ष रखा। कुछ कागजात भी दिखाए, मगर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने कहा कि प्रशासन नियम कानून के तहत कार्रवाई कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट तक का आदेश है कि ताल-पोखरे की जमीन से कब्जा हटवाया जाए। सरकारी अभिलेखों में जमीन ताल के तौर पर दर्ज है। उन्होंने चेताया कि सात दिन के भीतर संबंधित लोग घर खाली कर दें। ताल की जमीन पर जो भी निर्माण हुए हैं वे सभी गिराए जाएंगे। उधर, ताल की जमीन खाली कराने को लेकर चल रहे अभियान के तहत मंगलवार को मौके पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। ज्वाइंट मजिस्ट्रेट और उनकी टीम, दस्तावेज जांचने में ही लगे रहे कि इस पूरे खेल में राजस्व, जीडीए और नगर निगम की क्या भूमिका है।
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