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यूपी में स्कूलों को मिलेगी मूल्य आधारित शिक्षा की 'अनुभूति', दिल्ली से प्रतिनियुक्ति पर लौटे इस शिक्षक ने की पहल

Sun, 17 Jan 2021 04:32 PM IST
vivek shukla विवेक सिंह, गोरखपुर।
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पाठ्यक्रम तैयार करने वाले पूर्व माध्यमिक विद्यालय पर तैनात श्रवण कुमार शुक्ल। - फोटो : अमर उजाला
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एक ओर बच्चों को महंगे से महंगे व प्रतिष्ठित, सभी सुविधाओं से भरपूर स्कूलों में भेजने की होड़ है, तो दूसरी ओर ऊंची आय व नौकरी का मार्ग प्रशस्त करने वाली कोचिंग क्लासों में भीड़ लगी हुई है। इन सब सरगर्मियों में नैतिक मूल्यों की बात कहीं दब-सी गई है। यदि कोई भूले-बिसरे नैतिक मूल्यों की शिक्षा की बात कर भी देता है, तो ऐसी प्रतिक्रिया मिलती है जैसे कोई बहुत पुरानी सी आउटडेटेड बात कह दी हो या फिर इसे धार्मिक शिक्षा के साथ जोड़ दिया जाता है।
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अब इसी मूल्यों पर आधारित शिक्षा को दिल्ली के हैप्पी स्कूलों में लागू कर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पत्नी व अमेरिका की फर्स्ट लेडी मेलानियां ट्रंप से वाहवाही लूटने वाली टीम के सदस्य रहे श्रवण शुक्ला ने उत्तर प्रदेश के स्कूलों के लिए 'अनुभूति' पाठ्यक्रम तैयार किया है।

श्रवण ने बकायदा इसके लिए कक्षा एक से दसवीं तक का पाठ्यक्रम तैयार कर लिया है। अगले सप्ताह तक वो इसका प्रस्ताव बनाकर सचिव बेसिक शिक्षा परिषद और शिक्षा महानिदेशक को भेज देंगे। अमर उजाला संवाददाता से बातचीत में श्रवण ने बताया कि मूल्य आधारित शिक्षा का तात्पर्य दूर-दूर तक किसी एक धर्म की शिक्षा से नहीं है। कुछ ऐसे शाश्वत नैतिक मूल्य हैं जो सभी धर्मों को मान्य होते हैं और जो कभी पुराने नहीं पड़ते हैं, सदा किसी स्वस्थ व ईमानदार समाज के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। क्या ऐसे नैतिक मूल्यों को शिक्षा में महत्वपूर्ण स्थान नहीं मिलना चाहिए?
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पांच साल से दिल्ली में प्रतिनियुक्ति में थे श्रवण

गोरखपुर के पिपराईच ब्लॉक स्थित कंपोजिट विद्यालय चिलबिलवां पर तैनात रहे श्रवण शुक्ला को वर्ष 2016 में प्रतिनियुक्ति के आधार पर दिल्ली के सरकारी स्कूलों में हैप्पीनेस पाठ्यक्रम तैयार करने की जिम्मेदारी मिली थी। 20 लोगों की टीम के साथ मिलकर श्रवण ने हैप्पीनेस क्लासेस का संचालन शुरू किया। अब वहां के 1024 सरकारी स्कूलों में करीब 8.5 लाख विद्यार्थियों को इसका लाभ मिल रहा है। इसी वर्ष वो दिल्ली सरकार से प्रतिनियुक्ति का समय खत्म कर लौटे हैं।

क्या होगी अनुभूति की खासियत
नर्सरी से आठवीं तक के बच्चों का रोज पहला पीरियड यानी 40 मिनट आनंद के लिए होता है। बच्चों को पहले सहज किया जाता है। उन्हें ज्ञानवर्धक, मानव से मानव और मानव-प्रकृति के बीच के संबंधों और निर्वाह किए जाने वाले मूल्यों पर आधारित कहानियां दिलचस्प अंदाज में सुनाई जाती हैं। इसके बाद इन पर चर्चा होती है। गतिविधियां कराई जाती हैं। इसमें बच्चे को परीक्षा नहीं देना होता है बल्कि बच्चे स्व मूल्यांकन करते हैं। सप्ताह के आखिरी दिन विद्यार्थियों को अपने भावों को व्यक्त करने का अवसर दिया जाता है। वे अपने जीवन में आ रहे सकारात्मक बदलावों को भी साझा करते हैं।
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