‘‘जब हमें मां के सीने की गर्मी चाहिए, पिता की भाव भरी गोद, उस वक्त हम गत्ते के डिब्बे में, कभी नाली तो कभी कपड़ों में लिपटे रेलवे प्लेटफार्म पर पड़े होते हैं। अपनों के ठुकराए। हम आपके शहर में जन्मे वे नवजात हैं, जो कभी लिंगभेद का तो कभी उन शारीरिक संबंधों का शिकार हो रहे हैं, जिन्हें सामाजिक मान्यता नहीं। पीपीगंज में मुझे शायद 28 जनवरी को इसलिए मार दिया गया कि मैं एक अविवाहित नाबालिग के यहां जन्मी। सबको पता चल जाता तो इज्जतदार बाप की इज्जत चली जाती।
इसी बुधवार को मैं एक अभागा मोहद्दीपुर विंध्यवासिनी पार्क के नाले में गत्ते के डिब्बे में पड़ा था। मृत। मैं मरा कैसे, अब 72 घंटे के बाद मेरा पोस्टमार्टम होगा। यह कैसा सिलसिला है, 18 नवंबर की बात है। चौरीचौरा में मेरे मां-बाप ने मुझे झाड़ियों में फेंक दिया। क्या बस इसलिए कि मैं बेटी हूं ? बेटियां बचेंगी नहीं तो बढ़ेंगी और पढ़ेंगी कैसे? चलो खैर वो तो बेटी थी, न जाने कब से फेंकी जा रही है।
18 सिंतबर के दिन रेलवे स्टेशन पर मुझ बेटे को क्यों फेंक दिया गया? यह मेरे मां-बाप बता सकते हैं। उनको आखिर कौन ढूंढेगा, वहीं पुलिस जो बच्चे को लावारिस छोड़ने वालों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज करने से बचती है। आपको पता है, मेरे मां-बाप के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने के लिए वकील अमर उजाला वाले लेकर आए थे।
67 सीसीटीवी कैमरों के बीच से गुजर कर मुझे फेंका गया था। मुझे मरने के लिए छोड़ने वालों का पुलिस आज तक नहीं पता लगा पाई। सोचिए, कोई वहां विस्फोटक रख गया होता तो? हम लावारिसों के बहाने पुलिस को कसिए तो।
छह और आठ नवंबर को हम दो अभागे पीपीगंज और बड़हलगंज में मिले। कानून होने के बाद भी पुलिस ने एसएसपी की नहीं सुनी। जीडी में तस्करा डाला, काम खत्म। सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता, 18 नवंबर को गोला और चौरीचौरा में फिर हम दो लावारिस मिले और एसएसपी ने जोर लगाया। 154 साल में पहली बार पुलिस 318 आईपीसी में खुद वादी बनी। मुकदमा दर्ज हुआ।
शायद वे सब खुशकिस्मत थे, जो इस दुनिया में नहीं रहे। हम जो बच गए बस इंतजार कर रहे हैं कि पुलिस हमारे मां-पिता का पता लगाए। चाइल्ड लाइन में हम इस उम्मीद से पल रहे हैं कि हमारे मां-पिता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो तो हमारे जैसे और नवजात चाइल्ड लाइन में आने से बच जाएं। बेरहमी से मारकर नालियों- झाड़ियों में फेंके जाने से बच जाएंगे।’’
हम अभागे नवजात