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माता सीता के श्राप से खौफ में हैं 700 गांवों के लोग, आज भी नहीं करते हैं ये काम

Sat, 19 Sep 2020 03:10 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, विक्रमजोत (बस्ती)।
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प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला।
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मनोरमा और सरयू नदी के बीच के भू-भाग में स्थित बस्ती जिले के हर्रैया तहसील के करीब 700 गांवों में चने की खेती नहीं की जाती है। जबकि कृषि विज्ञानियों के अनुसार, यह क्षेत्र चने की खेती के लिए उपयुक्त है। किंवदंती है कि माता सीता के श्राप के कारण क्षेत्र के लोग त्रेतायुग से ही चने की खेती नहीं करते हैं।
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विक्रमजोत ब्लॉक क्षेत्र के मल्हूपुर अमोढ़ा निवासी पं. अनिरुद्ध मिश्रा बताते हैं कि इस क्षेत्र में त्रेतायुग से ही चने की खेती नहीं होती है। किंवदंती है कि प्रभु श्रीराम जनकपुर से माता सीता को लेकर अयोध्या लौट रहे थे। इस दौरान रास्ते में खेत मिला, जिसमें चने की फसल काटी गई थी। इसकी खूंटियां माता सीता के पैरों में चुभ गईं।

इससे नाराज होकर माता सीता ने श्राप दिया कि यदि इस क्षेत्र में कोई चने की फसल की बुआई करेगा तो उसका अनिष्ट हो जाएगा। तभी से यहां चने की खेती नहीं की गई। यदि कोई परंपरा को तोड़कर ऐसा करता है तो उसे हानि होती है।
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धनतेरस के दिन कनक भवन में अर्जी देकर कर सकते हैं खेती

नेतवर गांव निवासी शिक्षक ओम प्रकाश तिवारी बताते हैं कि सरयू नदी के उत्तर व मनोरमा नदी के दक्षिण के किसान चने की खेती नहीं करते हैं। इस भू-भाग में विक्रमजोत, दुबौलिया, परशुरामपुर व कप्तानगंज ब्लॉक का कुछ हिस्सा आता है।

कृषि विज्ञान केंद्र बंजरिया के वैज्ञानिक डॉ. आरवी सिंह बताते हैं कि इन गांवों की मिट्टी चने की खेती के लिए उपयुक्त है। काफी प्रयास किया गया लेकिन लोग पूर्व की परंपरा को तोड़ना नहीं चाहते हैं।

विक्रमजोत ब्लॉक के गोरसरा-तिवारी निवासी अशोक पांडेय और दुर्गा प्रसाद बताते हैं कि श्राप के बाद लोगों ने माता सीता से गुहार लगाई की मैया विकल्प सुझाएं, तो माता ने धनतेरस के दिन चने की बुआई की इजाजत दी। ऐसा करने से किसान अनिष्ट होने से बच सकते हैं। इसी मान्यता के कारण आज भी धनतेरस के दिन अयोध्या स्थित कनक भवन में माता सीता के दरबार में इजाजत के लिए भारी भीड़ होती है।
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