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जानिए 104 साल के नरमू महामंत्री के जिंदगी जीने का राज, बोले- जीना है तो मरना सीखो...

Mon, 28 Dec 2020 10:42 AM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
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नरमू महामंत्री केएल गुप्त। - फोटो : अमर उजाला।
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एनई रेलवे मजदूर यूनियन के महामंत्री केएल गुप्त का नाम जुबां पर आते ही सौ साल से अधिक उम्र के युवा की तस्वीर दिमाग में घूमने लगती है। कूल्हे की हड्डी टूटने के बाद भी जज्बा कम नहीं हुआ। रेलकर्मियों के लिए संघर्ष का जुनून ऐसा था कि 104 वर्ष की उम्र में भी जल्द ही स्वस्थ होकर न सिर्फ लौटे, बल्कि दोगुनी ऊर्जा से काम करने लगे। रविवार को वे नरमू के 60वीं बार महामंत्री चुने गए। सकारात्मक ऊर्जा से लबरेज केएल गुप्त ने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण पलों को एक शेर सुनाकर साझा किया- जीना है, रहना है तो मरना भी सीखो, कदम-कदम पर लड़ना सीखो। प्रस्तुत है अमर उजाला संवाददाता से उनकी बातचीत...
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सवाल : कूल्हे की हड्डी टूटने के बाद क्या लगा? सोचा था कि दोबारा सक्रिय हो पाएंगे?
जवाब : जब हड्डी टूटी तो निराशा हुई, लेकिन हार नहीं मानी। अस्पताल में भी संगठन का काम करता रहा। कर्मचारियों की लड़ाई में लगा रहा और आज चुस्त-दुरुस्त आपके सामने हूं।

सवाल: 60 वर्ष से पदाधिकारी हैं, कर्मचारियों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है, व्यक्तिगत कितना नुकसान हुआ।
जवाब : मैंने अपना जीवन कभी व्यक्तिगत माना नहीं। संगठन को ही परिवार मानता हूं। वही मेरा घर है। आज भी दफ्तर में ही सोता हूं। 1974 में जब रेलवे में आंदोलन हुआ तो मीसा के तहत एक महीने जेल में रहा। छूटकर आया तो नौकरी से रिमूव कर दिया गया। पेंशन भी नहीं मिली।
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सवाल : जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि किसे मानते हैं?

नरमू महामंत्री केएल गुप्त। - फोटो : अमर उजाला।
जवाब : जब मैं लेखा विभाग में कार्यरत था तो मानदेय पर कार्यरत 400 लोगों को नियमित करने के लिए सर्विस कमीशन की ओर से परीक्षा के लिए बुलाया गया। रिजल्ट देखा तो आश्चर्य हुआ कि सभी को फेल कर दिया गया। मुझसे रहा नहीं गया, इसे लेकर आंदोलन शुरू किया। कामयाबी मिली और सभी 400 लोगों को पास कर नियमित किया गया। यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। हां, यह जरूर है कि अपने बेटे को नौकरी नहीं दिला सका।

सवाल : आर्मी से रेलवे में आना कैसे हुआ और यूनियन की राजनीति में आने की प्रेरणा कहां से मिली?
जवाब : एआईआरएफ के अध्यक्ष कटिहार के सांसद प्रिय गुप्त से प्रेरित था। लेकिन लोकनायक जयप्रकाश की गोरखपुर में सभा थी। उनका भाषण सुनकर बहुत प्रेरित हुआ और खुद को रोक नहीं सका। आर्मी छोड़कर रोजगार कार्यालय में नौकरी की। 1951 में रेलवे में लेखा सहायक पद पर नियुक्त हो गया।

सवाल : आपकी पढ़ाई-लिखाई कहां हुई?
जवाब : जीवन तो बचपन से ही संघर्षमय था। रहने वाला तो मैं बांसगांव का था। पिता के देहांत के बाद माता पार्वती देवी मुझे लेकर मुफ्तीपुर मोहल्ले में ननिहाल में रहने लगीं। यहीं पढ़ा लिखा, उस समय महाराणा प्रताप महाविद्यालय था, जिसमें स्नातक की पढ़ाई की।
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सवाल : सुना है कि अस्पताल से आने के बाद अब आपने आहार और कम कर दिया है?

नरमू महामंत्री केएल गुप्त। - फोटो : अमर उजाला।
जवाब : हंसते हुए, लोग कहते हैं कि मेरी हड्डी दधीचि की है। दिन में एक बार दो रोटी-दाल खाता हूं। अक्सर बेटी खाना लेकर आ जाती है। रात में भोजन नहीं करता हूं। दोपहर में चाय के साथ कुछ मिल गया तो ठीक वरना दिन यूं ही गुजर जाता है।  

सवाल : इतनी उम्र हो गई है, सब कुछ याद है आपको ?
जवाब : सही कहा आपने, भूला तो कुछ नहीं हूं। किससे क्या काम कहा हूं, सब याद रहता है। मुझे लगता है कि सक्रियता और लिखने-पढ़ने से ही याददाश्त सही है। बाकी सब ईश्वर की देन है।

सवाल : इतनी उम्र में भी फिट हैं, इसका क्या राज है?
जवाब : नियमित जीवन। आज भी सुबह जल्दी उठ जाता हूं और व्यायाम करता हूं। कम खाता हूं ज्यादा काम करता हूं। हो सकता है इसी से फिट हूं।
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