बरेली जिले के फतेहगंज इलाके के मूल निवासी याकूब ने बताया कि सब्जी की खेती का उनका पुश्तैनी धंधा है। उनके बाप-दादा ने पहले पंजाब, राजस्थान में नदी के किनारे सब्जी की खेती शुरू की। खेती बाड़ी का हुनर सीखने के बाद अब वे गोरखपुर-बस्ती मंडल में नदी के किनारे खेती कर रहे हैं।
यहां खेती करने के इरादे को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि पहले उनकी सब्जियां बरेली, शाहजहांपुर से गोरखपुर मंडी में आती थीं। उसी बीच उन लोगों का संपर्क आढ़तियों से हुआ। पहले फोन पर बात हुई फिर यहां आए। सबसे पहले सिद्धार्थनगर में सब्जी की खेती शुरू की। अब गोरखपुर आए हैं। पहले पूर्व मेयर अंजू चौधरी के नदुआ स्थित गांव में सब्जी की खेती शुरू की। उसके बाद लालपुर टीकर, डोमिनगढ़ में। याकूब का कहना है कि वह विगत 20 सालों से गोरखपुर जिले में सब्जी की खेती करते हैं।
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चार हजार रुपये प्रति एकड़ पर है एक साल का एग्रीमेंट
याकूब के साथ आए बशीर अहमद, मोहम्मद शमी, सईद अहमद ने बताया कि कुछ लोगों ने संपर्क किया और जमीन दिखाई। हम लोगों को जमीन पसंद आ गई तो यहां पर सब्जी की खेती को तैयार हो गए। बताया कि यहां पर एक जज साहब की सबसे अधिक जमीन करीब 40 एकड़ है। उनके अलावा राधेश्याम दुबे, दिग्विजय दुबे की जमीन पर भी खेती कर रहे हैं। जिस जमीन पर सब्जी उगाए हैं, उस पर पहले खर-पतवार थे। उसे निकालने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। चार हजार रुपये प्रति एकड़ में खेत मिला है और खेती में लागत 12 से 13 हजार रुपये प्रति एकड़ आई है।
सब्जी की खेती कर रहे याकूब व बशीर ने बताया कि खेत में खर को निकालने के लिए उन लोगों को कई महीने तक जेसीबी चलवानी पड़ी। खर को निकालने के बाद खेतों की काफी जुताई की गई है। खेतों में डालने के लिए 2000 रुपये ट्राली गोबर की खाद लाए। करीब 8 लाख की गोबर की खाद खेतों में डाला है। गोबर की खाद लाने के लिए 20 किलोमीटर तक गांव -गांव जाना पड़ा। तब जाकर यह रेत का मैदान ,जहां केवल खर उगता था आज हर तरफ हरियाली दिख रही है।
दिवाली के बाद से जुटे हैं खेती में
सब्जी की खेती करने वालों ने बताया कि वह लोग दिवाली के बाद यहां आ गए। उसके बाद खेती में जुट गए। होली के आसपास सब्जी निकलने लगती हैं। शुरुआती दौर में रेट ज्यादा रहता है। अधिक सब्जी निकलने पर बाजार नरम हो जाता है। इस साल अधिक पूंजी लगने के फायदा ज्यादा नहीं है। लेकिन, अब मुनाफा होने की उम्मीद है। याकूब ने बताया कि उनकी सब्जी गोरखपुर, कसयां, देवरिया, आजमगढ़, मऊ की मंडी में जाती है।