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Exclusive: 'न उद्योग लगाने को जमीन, न फाइनांस, यही हाल रहा तो उद्यमी छोड़ देंगे गोरखपुर'

Fri, 03 Jan 2020 08:08 AM IST
विजय जैन राजीव रंजन, अमर उजाला, गोरखपुर

सार

  • शुद्ध प्लस समूह और नाइन के प्रबंध निदेशक अमर तुलस्यान से स्पेशल बातचीत
  • गोरखपुर का नाम देखकर लोन की फाइल बंद कर देते हैं बैंक, ऐसे विपरीत परिस्थितियों से जूझ रहे हैं, गोरखपुर के उद्यमी
  • औद्योगिक नीतियों से जुड़े ब्यूरोक्रेट्स की प्राथमिकता में गोरखपुर कहीं भी नही
  • गैलेंट समूह और महावीर जूट मिल के बाद गोरखपुर में उद्योगों की स्थापना को लेकर सिस्टम की कमजोरियों पर अमर तुलस्यान ने भी उठाए सवाल
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शुद्ध प्लस समूह और नाइन के प्रबंध निदेशक अमर तुलस्यान से स्पेशल बातचीत - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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गोरखपुर में उद्योगों को स्थापित करने के लिए जमीन नहीं मिल पा रही है। किराये के भवन, भूमि पर उद्योग चला रहे हैं। यही हाल रहा तो न चाहते भी गोरखपुर के उद्यमियों को बाहर का रास्ता देखना  पड़ेगा।
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औद्यौगिक नीति बनाने वाले ब्यूरोक्रेट्स की कार्यप्रवृत्ति के खिलाफ गीडा के स्थापना दिवस के अवसर पर चार दिसंबर को आयोजित समारोह में गैलेंट इस्पात के प्रबंध निदेशक चंद्रप्रकाश अग्रवाल ने जो आवाज उठाई थी, महावीर जूट मिल के निदेशक पीके मसकरा के बाद अब उसे शहर के एक और नामी उद्योगपति का साथ मिल गया है।

ये हैं, शुद्ध प्लस समूह और नाइन के प्रबंध निदेशक अमर तुलस्यान । उनका कहना है कि  प्रदेश सरकार की ब्यूरोक्रेसी में गोरखपुर को लेकर जो धारणा बनी हुई है, उसका खामियाजा गीडा व उद्यमियों को पिछले 30 वर्षों से भुगतना पड़ रहा है। गीडा हमेशा ही गलत नीतियों पर चला है। छोटे छोटे उद्योग लगवाए गए, लेकिन इसमें गलती गीडा की नहीं बल्कि पिछली सरकारों की है।
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न तो सरकार की ओर से फंड उपलब्ध कराए गए और न ही बड़े उद्योगों को स्थापित कराने की पहल की गई। सबसे बड़ा दुख यह है कि अब भी ऐसा कुछ नहीं हो रहा है। अगर सरकार पैसा लगाकर गोरखपुर में जमीन खरीद कर लेती तो लखनऊ की ब्यूरोक्रेसी भी बड़े उद्योग को यहां डायवर्ट करने पर विवश हो जाती।

गोरखपुर में उद्योगों की स्थापना को लेकर अमर उजाला के सीनियर रिपोर्टर राजीव रंजन ने शुद्ध प्लस समूह के प्रबंध निदेशक अमर तुलस्यान से तमाम सवाल किए और उन्होंने बड़ी बेबाकी से जवाब दिए। तो पढ़िए क्या कहते हैं, तुलस्यान -

जवाब: ब्यूरोक्रेसी को । औद्योगिक नीति चाहे कितनी भी बेहतर बना लें, लेकिन ब्यूरोक्रेसी (औद्योगिक नीति बनाने वालों) की मानसिकता बदलने की आवश्यकता है। दरअसल गोरखपुर या गीडा को लेकर उनके मन में कभी भी यह नहीं रहा कि यहां भी बड़ा निवेश हो सकता है। गीडा की स्थापना के  30 वर्ष हो गए।

आप ही देखिए, नोएडा कहां से कहां पहुंच गया और गीडा अब भी वहीं का वहीं है। लखनऊ सचिवालय आज भी गीडा को उतना महत्व नहीं देता है, जबकि यह सीएम सिटी है। पूर्वांचल में गीडा में बड़े उद्योगों को स्थापित करने के लिए प्रेरित करने के मामले में लखनऊ की ब्यूरोक्रेसी की हमेशा उदासीनता रही है।

अगर चार से पांच हजार एकड़ का लैंड बैंक बना दें तो लखनऊ की ब्यूरोक्रेसी बड़े उद्योगों को यहां आने के लिए प्रेरित और बाध्य करेगी। ऐसे में जो बड़े उद्योग आएंगे, उन्हें गोरखपुर आने के लिए प्रेरित किया जाएगा कि वो गोरखपुर में उद्योग लगाएं। यहां स्किल्ड लेबर उपलब्ध है। सिंगल विंडो सिस्टम में सारी एनओसी उपलब्ध है। यह गोरखपुर में औद्योगिक विकास की ठोस शुरुआत होगी। आगे चलकर पूर्वांचल का विकास भी होगा, नहीं तो गीडा में ऐसे ही छोटे छोटे उद्योग स्थापित होते और बंद होते रहेंगे। जैसा कि पिछले 25-30 वर्षों में होते रहे हैं।  

सवाल: उद्योगों को लेकर किस तरह की दिक्कत या चुनौतियां हैं?

जवाब- उद्योग चलाने के लिए कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। एमओयू करने के साथ ही प्रदेश सरकार से इंडस्ट्रीज के विस्तारीकरण के लिए 25 एकड़ जमीन  मांगी है। दो साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन आज तक जमीन उपलब्ध नहीं कराई गई। किसी तरह से इंडस्ट्रीज चल रही हैं। एक तरह से मशीनें ठूंस ठूंसकर किसी तरह से काम चलाया जा रहा है।

आप ही बताएं अगर जमीन नहीं मिली तो क्या होगा? या तो गोरखपुर से बाहर चला जाऊंगा या प्रदेश से बाहर। ऐसी स्थिति नहीं आनी चाहिए। शुद्ध प्लस समूह की स्थापना के 12 साल हो गए हैं, लेकिन आज भी मेरे पास अपनी कोई जमीन नहीं है। आज भी किराए की जमीन, भूमि पर अपनी इंडस्ट्रीज चला रहा हूं। गीडा के पास जमीन मांगने जाएं तो उनके पास जमीन ही नहीं है।

यूपी इनवेस्टर्स समिट में 80 करोड़ का एमओयू किया था। इसमें 55 करोड़ का निवेश कर चुके हैं। 50 करोड़ का निवेश मार्च 2020 तक पूरा हो जाएगा। इस लिहाज से हम करीब 105 करोड़ रुपये का निवेश कर चुके हैं। एक हजार से लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार उपलब्ध कराया जा चुका है। नाइन ब्रांड से करीब 1600 लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलेगा।    

सवाल: ऐसा क्यों है कि उद्योगपति मुखर होकर बोलने लगे हैं?
जवाब: एक उद्योगपति अपनी फैक्ट्री बंद कर यहां से चला जाता है या स्थिति से परेशान होकर कुछ कहने को मजबूर होता है। जैसा कि चंद्रप्रकाश अग्रवाल जैसे बड़े उद्योगपति ने किया। ऐसे में प्रश्न तो उठेगा। कहा जाएगा कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है।

यह सोचने की जरूरत है कि जो इतना बड़ा उद्योग चला रहा है कि उसे क्यों विरोध में बोलना पड़ रहा है, जबकि कोई भी सरकार के खिलाफ नहीं बोलना नहीं चाहता है। ऐसे में प्रदेश सरकार या ब्यूरोक्रेसी को इस बात को समझने की आवश्यकता है कि पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश का जो असंतुलन है, उसमें सुधार की आवश्यकता है।

लांग टर्म विजन प्लानिंग के हिसाब से लेकर चलना चाहिए, ताकि पूरे प्रदेश में समानता आ जाए। हम किसी भी मायने में किसी से भी कम नहीं हैं।  

 

सवाल: उद्योगों की स्थापना के लिए बैंकों का रवैया कैसा है?

जवाब: लैंड बैंक की कमी के साथ उद्योगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बैंकों से फाइनेंस न मिल पाने की है। आज कोई 5 से 100 करोड़ रुपये लागत का उद्योग स्थापित करना चाहता है तो पूर्वांचल या पूर्वी उत्तर प्रदेश में बहुत मुश्किल है, क्योंकि बैंकिंग सेक्टर में पूर्वांचल की इमेज बहुत खराब है। बैंक लोन देन से कतराते हैं, जबकि बिना बैंक फंडिंग के उद्योग स्थापित नहीं हो सकते हैं।

राजस्थान और गुजरात में जो उद्योग विकसित हुए वह बैंकिंग सपोर्ट की वजह से ही संभव हो सका है। इस मामले में केंद्र सरकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता है। केंद्र सरकार को विश्वास में लेकर प्रदेश सरकार को कुछ नई तरह की नीति बनानी चाहिए। अभी हाल में प्रदेश सरकार ने टेक्सटाइल पॅालिसी में ब्याज में सात प्रतिशत की छूट का प्रावधान किया है।

अगर प्रदेश सरकार की यूपीएफसी या पिकअप जैसी फाइनेंशियल संस्थाएं दो या तीन प्रतिशत महंगे ब्याज दर पर भी समय से फंड उपलब्ध करा दें तो उद्योग लग और चल  पाएंगे। अन्यथा आज के माहौल में बैंकों के भरोसे उद्योग लगाना और चलाना बहुत ही कठिन है।

सरकार को अपनी औद्योगिकी पॉलिसी के साथ फाइनेंस की उपलब्धता जल्द आसान शर्तों पर कराना चाहिए। औद्योगिक ऋण के लिए सभी बैंकों का कोटा होता है, लेकिन यहां का कोटा पश्चिमी भारत में शिफ्ट किया जा रहा है। अगर पूर्वांचल या पूर्वी उत्तर प्रदेश के पिछड़ेपन को दूर करना है तो बैंकों को लोन देने के लिए बाध्य करना पडेगा।

सवाल: आपको पूर्वी उत्तर प्रदेश में औद्योगिक विकास की क्या संभावना नजर आती है?
जवाब: यूपी को देखें तो 23 करोड़ की जनसंख्या के साथ विश्व की पांचवीं बड़ी जनसंख्या है। जनसंख्या के लिहाज से देखें तो यह अपने आप में एक देश जैसा है, लेकिन जब पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तुलना करते हैं तो पाते हैं कि हम औद्योगिक रूप से काफी पिछड़े हुए हैं। जब पूर्वी उत्तर प्रदेश में उद्योग लगेंगे तो ही संतुलन बराबर होगा। 

इसकी बेहतरी के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तब से लड़ाई लड़ रहे हैं, जब से वो सांसद रहे। उन्होंने प्रदेश सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक इसके लिए लड़ाई लड़ी है। उद्योग लगता है तो इसके साथ सिर्फ रोजगार ही पैदा नहीं होता, बल्कि उसके 100 से 150 किलोमीटर के क्षेत्र तक विकास की गूंज सुनाई देती है। गीडा ही इसका उदाहरण है।

सहजनवां समेत आसपास के कई इलाकों की स्थिति काफी अच्छी हो गई है। आज गोरखपुर में औद्योगिक निवेश के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर काफी बेहतर है। एयर कनेक्टिविटी पांच, छह शहरों से है। पूर्वोत्तर रेलवे का हेडक्वार्टर है। रोड कनेक्टिविटी भी बेहतर हो गई है। बिजली की स्थिति भी काफी अच्छी है। 22 से 23 घंटे तक बिजली की उपलब्धता है।  
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सवाल: तो फिर कमी कहां रह गई है?

जवाब: गीडा में टेक्सटाइल पार्क जैसी यूनिटें नहीं आईं। इससे उद्योगों को काफी सपोर्ट मिलता। टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज को सरकार ने कोई इंसेटिव स्कीम नहीं दी। इसकी वजह से गीडा की कई औद्योगिक इकाइयां उत्तराखंड के काशीपुर चली गईं। अब जो प्रदेश की औद्योगिक नीति आई है, वह काफी अच्छी है।

इसमें पूर्वांचल और बुंदेलखंड के लिए अलग से पैकेज जरूर दिए हैं, लेकिन अब भी उस हिसाब से यहां उद्योग नहीं लग रहे हैं। पूर्वी उत्तर में जमीन की कीमत देखें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश या पश्चिमी भारत की तुलना में सस्ती है। और जब बड़े उद्योग लगते हैं तो जमीन की कीमत उद्योगपित के लिए कोई बहुत मायने नहीं रखती।  

सवाल: कोई नमूना बता सकते हैं, जहां कई कमजोरियों के बावजूद सरकार की प्रोत्साहन नीति के चलते अच्छे नतीजे सामने आए हैं ?
भीलवाड़ा में न तो एयर कनेक्टिविटी है और न रोड और रेल कनेक्टिविटी है, लेकिन वहां की औद्योगिक निवेश की स्थिति गोरखपुर से बहुत बेहतर है। यह सिर्फ वहां की सरकार की प्रोत्साहन नीति की वजह से संभव हो सका है। सरकार ने इनसेंटिव समेत कुछ और सुविधाएं दीं। अब भीलवाड़ा देश का सबसे बड़ा टेक्सटाइल सेंटर है। यह पॉलिटिकल विल पावर की वजह संभव हो सका है।

यूपी में भी औद्योगिक निवेश के लिए माहौल बहुत अच्छा है। लॉ एंड ऑर्डर की कोई समस्या नहीं है, लेकिन गोरखपुर में लैंड बैंक की समस्या बहुत बड़ी है। कोई भी उद्योगपति कोई प्रोजेक्ट दिमाग में लेकर आया है तो वह जल्द से जल्द उद्योग स्थापित करना चाहता है। वह साल-दो साल इंतजार नहीं कर सकता है। ऐसे में कोई भी उद्योग स्थापित करने के लिए बिहार, राजस्थान या जहां का भी माहौल बेहतर है, वहां चला जाएगा। यूपी में 500 एकड़ जमीन नहीं मिल पा रही है।

सवाल: ‘नाइन’ के विस्तारीकरण को लेकर आपकी क्या योजना है?
जवाब: एक तरह से कहें तो ‘नाइन’ ब्रांड मेड इन इंडिया और मेड इन यूपी को मूर्त दे रहा है। ‘नाइन’ सेनेटरी नेपकिन मेरा तो सपना और कमिटमेंट है। सेनेटरी नेपकिन और बेबी डाइपर का 90 प्रतिशत शेयर मार्केट पर मल्टी नेशनल कंपनियों का कब्जा है।

प्रधानमंत्री के मेड इन इंडिया, मुख्यमंत्री के मेड इन यूपी के साथ मैंने मेड इन गोरखपुर और मेड इन सहजनवां का सपना देखा है। यह ब्रांड पूरे देश में छाने को बेताब है। हमारा बाजार 15-16 राज्यों में हो गया है। अगर सरकारी सहायता के साथ नीतियों का लाभ समय से मिले तो यहां के उद्योगों का तेजी से विकास होगा।
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