झोला बनाने वालों में बीए तृतीय वर्ष की छात्रा नौशाबाह भी शामिल हैं। वह पिछले पांच साल से यह काम कर रही है। घर के अन्य सदस्य भी इसमें सहयोग करते हैं। झोला बनाने वाले कारीगर मो. रफी ने बताया कि बाजार से वह झोला बनाने के ऑर्डर लेकर आते हैं।
थोक में एक दर्जन झोला 145 से 180 रुपये में बिकता है। कहा कि एक सप्ताह में लगभग 200 झोला तैयार कर दिया जाता है। इसके साथ ही इस क्षेत्र के बहरामपुर, बहादुर शाह जफर कॉलोनी में भी कई मुसलमान कांवड़ियों के लिए झोले और कपड़े बना रहे हैं।