पांच फुट से अधिक गहराई में दबाएं अवशेषों को
गोरखपुर विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. उमेश नाथ त्रिपाठी बताते हैं कि प्रतिमाएं बनाने के लिए प्लास्टर ऑफ पेरिस का प्रयोग हो रहा है। इसे मजबूती देने के लिए उसमें फाइबर मिलाया जाता है। इसे ऑयल पेंट से रंगा जाता है। वाष्पशील पेट्रोलियम पदार्थ का वाष्पन पर्यावरण के लिए हानिकारक होता है।
पानी में पड़े इन अवशेषों को नष्ट करने के लिए जब इन पर ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव होता है तो रासायनिक क्रियाओं के फलस्वरूप क्लोरिन समेत कई हानिकारक गैस उत्सर्जित होती हैं। यह स्थिति जलीय जीवों के लिए भी घातक होती है।
इसे भी पढ़ें: गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर लगेंगे 317 कैमरे, अपराधियों पर रहेगी नजर
निस्तारण के लिए होना चाहिए प्रबंध
विशेषज्ञाें का कहना है कि देवी प्रतिमाओं के निर्माण व निस्तारण में वैज्ञानिक पद्धति का विशेष ख्याल रखना होगा, क्योंकि पहले इनके निर्माण में जहां मिट्टी में नष्ट होने वाले सामान और प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता था, वहीं अब कृत्रिम पेंट व अन्य ऐसे सामान प्रयुक्त होते हैं, जो आसानी से नष्ट नहीं होते। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी अनिल कुमार शर्मा का कहना है कि प्रतिमाओं के विसर्जन से होने वाली हानियों को देखते हुए ही इन्हें कृत्रिम तालाब में निस्तारित कराया जाता है। इसके अलावा निस्तारण उपायों पर भी निगरानी रखी जाती है।
इसे भी पढ़ें: नासिक में हुई बारिश तो आढ़तियों ने बढ़ा दिए प्याज के भाव
ये करना होगा उपाय
- प्रतिमाओं की संख्या सीमित करनी होगी तथा इनके निर्माण में प्राकृतिक सामान व रंगों का प्रयोग करना चाहिए।
- प्रतिमा विसर्जन के बाद अघुलनशील वस्तुओं को छांटकर तालाब के पानी से बाहर निकलें।
- अवशेष पदार्थों को सूखी जमीन पर पांच फुट से अधिक गहराई में गड्ढा खोदकर दबाएं।
- जिस जगह यह गड्ढा खोदा जाए, वहां जलस्तर 40 फुट से अधिक गहरा होना चाहिए।
- पानी में पड़े सड़ रहे अवशेषों पर ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव नहीं कराना चाहिए।