सीएमओ डॉ. आशुतोष कुमार दूबे ने बताया कि जिन गर्भवतियों की मौत हुई है, उनकी जांच में यह भी बात भी सामने आई है कि वे समय-समय पर होने वाली जांच भी नहीं कराती थी। इसके अलावा प्रसव का समय आने के दौरान इन महिलाओं को रक्तस्राव भी खूब हुआ। इलाज के दौरान जब तक गर्भवती अस्पताल पहुंची, तब तक उनकी स्थिति बेहद खराब हो चुकी थी। इसी वजह से उन्हें बचाया नहीं जा सका है। इसलिए सभी गर्भवतियों को सलाह दी जाती है कि हर तीन माह पर खून की जांच कराते रहे। साथ ही चार अल्ट्रासाउंड हर हाल में कराएं, जिससे कि गर्भ में पल रहे बच्चे की सही जानकारी मिल सके।
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मौत को रोकने के लिए ऑडिट जरूरी
सीएमओ ने बताया कि गर्भवतियों की मौत का ऑडिट कराने का उद्देश्य केवल इतना था कि उन मौतों को रोका जा सके। क्योंकि, एक बार अगर कारण पता चल जाएगा, तो उस पर काम किया जाएगा। इससे गर्भवतियों की मौत रूकेगी। साथ ही बताया कि अब तक जो मामले सामने आए हैं, उनमें 90 फीसदी मामले ग्रामीण क्षेत्रों के रहने वाले हैं।
खून की कमी से नहीं हो पाता बच्चे का विकास
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. सुधीर गुप्ता ने बताया कि गर्भवती महिलाओं में औसतन 12 ग्राम खून होना चाहिए। लेकिन, आम तौर पर 90 फीसदी महिलाओं में खून की कमी मिल रही है, जो चिंता का कारण है। खून की कमी के कारण गर्भ में बच्चे का सही तरह से विकास नहीं हो पाता। गर्भवती होने पर शरीर में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं। शरीर में रक्त की मात्रा लगभग 20-30 प्रतिशत बढ़ जाती है, जिससे आयरन और विटामिन की आपूर्ति बढ़ जाती है, जिसकी शरीर को हीमोग्लोबिन बनाने के लिए आवश्यकता होती है। इसकी कमी से मौत सबसे अधिक होती है।