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समय से नहीं मिल पा रहा इलाज: खून की कमी से जा रही गर्भवतियों की जान, इस रिपोर्ट से हुआ खुलासा

Wed, 24 May 2023 03:05 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।

सार

बीआरडी मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. सुधीर गुप्ता ने बताया कि गर्भवती महिलाओं में औसतन 12 ग्राम खून होना चाहिए। लेकिन, आम तौर पर 90 फीसदी महिलाओं में खून की कमी मिल रही है, जो चिंता का कारण है। खून की कमी के कारण गर्भ में बच्चे का सही तरह से विकास नहीं हो पाता।
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : pixabay
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विस्तार
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खून और आयरन की कमी से गर्भवतियों की जान जा रही है। 49 गर्भवतियों की मौत की ऑडिट में इसका खुलासा हुआ है। टीम में शामिल विशेषज्ञ डॉक्टरों ने बताया है कि जिन गर्भवतियों की मौत हुई है, उनमें खून की काफी कमी मिली है। इसके अलावा ये गर्भवतियां इलाज के लिए अस्पतालों में भी समय से नहीं पहुंच पाई हैं। इसकी रिपोर्ट स्वास्थ्य विभाग ने शासन को भेज दी है। गर्भवतियों की मौत की सही जानकारी के लिए शासन ने ऐसे मामलों का ऑडिट कराने का फैसला लिया था।

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इसके तहत उन केसों को दर्ज किया गया था, जिसमें गर्भवतियों की मौत हुई और वह मामले स्वास्थ्य विभाग की पकड़ में आए हैं। इसके तहत पिछले आठ माह के अंदर 49 ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें गर्भवतियों की मौत हुई है। इन मौतों का कारण जानने के लिए विभाग ने विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमेटी बनाई, जो उनके हर डाटा को इकट्ठा कर मामले की जांच की तो चौकाने वाले खुलासे हुए हैं। टीम ने बताया है कि जिन गर्भवतियों की मौत हुई है, उनमें खून की मात्रा पांच से छह ग्राम रही है।

इसकी वजह से उनके गर्भ में पल रहे भ्रूण का विकास भी अच्छा नहीं था। शरीर में खून की कमी के कारण गर्भवती एनिमिक हो गई थी, जिसके कारण गर्भ में पल रहे भ्रूण में ऑक्सीजन का संचार भी ठीक नहीं हो पा रहा था। प्रसव से पहले ही गर्भ में पल रहे भ्रूण की मौत भी हो गई थी। इसके अलावा इन गर्भवतियों में आयरन, फोलिक एसिड की कमी भी मिली है। जबकि, औसतन गर्भवतियों में 12 ग्राम खून होना चाहिए, जो आयरन और फोलिक एसिड की कमी को दूर करता है।
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हर तीन माह पर खून की जांच जरूरी

सीएमओ डॉ. आशुतोष कुमार दूबे ने बताया कि जिन गर्भवतियों की मौत हुई है, उनकी जांच में यह भी बात भी सामने आई है कि वे समय-समय पर होने वाली जांच भी नहीं कराती थी। इसके अलावा प्रसव का समय आने के दौरान इन महिलाओं को रक्तस्राव भी खूब हुआ। इलाज के दौरान जब तक गर्भवती अस्पताल पहुंची, तब तक उनकी स्थिति बेहद खराब हो चुकी थी। इसी वजह से उन्हें बचाया नहीं जा सका है। इसलिए सभी गर्भवतियों को सलाह दी जाती है कि हर तीन माह पर खून की जांच कराते रहे। साथ ही चार अल्ट्रासाउंड हर हाल में कराएं, जिससे कि गर्भ में पल रहे बच्चे की सही जानकारी मिल सके।

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मौत को रोकने के लिए ऑडिट जरूरी
सीएमओ ने बताया कि गर्भवतियों की मौत का ऑडिट कराने का उद्देश्य केवल इतना था कि उन मौतों को रोका जा सके। क्योंकि, एक बार अगर कारण पता चल जाएगा, तो उस पर काम किया जाएगा। इससे गर्भवतियों की मौत रूकेगी। साथ ही बताया कि अब तक जो मामले सामने आए हैं, उनमें 90 फीसदी मामले ग्रामीण क्षेत्रों के रहने वाले हैं।

खून की कमी से नहीं हो पाता बच्चे का विकास
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. सुधीर गुप्ता ने बताया कि गर्भवती महिलाओं में औसतन 12 ग्राम खून होना चाहिए। लेकिन, आम तौर पर 90 फीसदी महिलाओं में खून की कमी मिल रही है, जो चिंता का कारण है। खून की कमी के कारण गर्भ में बच्चे का सही तरह से विकास नहीं हो पाता। गर्भवती होने पर शरीर में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं। शरीर में रक्त की मात्रा लगभग 20-30 प्रतिशत बढ़ जाती है, जिससे आयरन और विटामिन की आपूर्ति बढ़ जाती है, जिसकी शरीर को हीमोग्लोबिन बनाने के लिए आवश्यकता होती है। इसकी कमी से मौत सबसे अधिक होती है।


 
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