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Amarmani Tripathi: सबकी नजर...अमरमणि की सियासी धुन पर्दे के पीछे से सुनाई देगी या आगे से, अटकलों का बाजार गर्म

Sat, 26 Aug 2023 10:37 AM IST
vivek shukla राजन राय, गोरखपुर।

सार

पूर्वांचल की राजनीति में अमरमणि त्रिपाठी का रसूख और राजनीतिक कद बड़ा रहा है। वर्ष 1956 में फरेंदा में जन्मे अमरमणि त्रिपाठी चार बार विधायक और दो बार यूपी सरकार में मंत्री रह चुके हैं। अपराध की दुनिया से राजनीति तक का सफर भी मुश्किलों भरा रहा है।
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पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी की रिहाई। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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लोकसभा चुनाव के पहले कवयित्री मधुमिता हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी की रिहाई से सियासी गलियारे में हलचल तेज हो गई है। कद्दावर नेता के रूप में पहचान रखने वाले अमरमणि त्रिपाठी के करीब 18 साल बाद जेल से बाहर आने पर पूर्वांचल के राजनीतिक समीकरण को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। सभी दलों में चर्चा है कि पूरे इलाके की नब्ज समझने वाले अमरमणि पर्दे के आगे रहकर राजनीति करेंगे या पीछे से। हालांकि, सजायाफ्ता होने के चलते अमरमणि चुनाव नहीं लड़ सकते, ऐसे में उनके आगे की सियासी धुन को लेकर गोरखपुर से महराजगंज तक चर्चाओं का बाजार गर्म है।

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पूर्व मंत्री पंडित हरिशंकर तिवारी के निधन के बाद पूर्वांचल के सियासी हल्के में ब्राह्मण चेहरे की कमी खल रही थी। ऐसे में लोकसभा चुनाव के ठीक पहले पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी का जेल से बाहर आना यहां की राजनीति में टर्निंग प्वाइंट हो सकता है। वैसे भी हरिशंकर तिवारी को गुरु मानकर ही कभी अमरमणि ने राजनीति की दुनिया में कदम रखा था। इसलिए सियासी दांव-पेच भी बखूबी पता हैं।

अक्तूबर 2007 में अमरमणि और उनकी पत्नी मधुमणि को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। इसके बाद वह चुनाव नहीं लड़ सके, लेकिन अपनी राजनीतिक विरासत बेटे अमनमणि को सौंप दी। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अमरमणि पर्दे के पीछे से राजनीतिक रूप से सक्रिय हो ही जाएंगे। अगर वह सीधे तौर पर आते हैं तो आत्मघाती कदम होने का भी खतरा रहेगा। लिहाजा अमरमणि के एक-एक कदम पर सभी राजनीतिक दलों की नजर होगी।
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पूर्व मंत्री के सियासत में आने के बड़े मायने हैं। एक तो पिछले कुछ साल से भाजपा से उनकी और बेटे की नजदीकियां भी रही हैं। दूसरे राजनीतिक दलों को भी पता है कि उनके गृह जनपद महराजगंज के अलावा सिद्धार्थनगर और संतकबीरनगर में उनकी सीधी पकड़ है। ऐसे में पर्दे के पीछे से ब्राह्मण चेहरे के तौर पर अमरमणि को लाया जा सकता है।

हालांकि अमरमणि की रिहाई और उसकी आगे की सियासत पर किसी दल ने कोई प्रतिक्रिया अभी तक नहीं दी है। सामाजिक चिंतक और राजनीतिक विशेषज्ञ भी खुलकर बोलने से परहेज कर रहे हैं। लेकिन अंदरखाने की चर्चा है कि अमरमणि के बाहर आने के बाद कई राजनीतिक दलों के सियासी समीकरण बदल सकते हैं।

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मुश्किलों भरा रहा अपराध की दुनिया से सियासी सफर

पूर्वांचल की राजनीति में अमरमणि त्रिपाठी का रसूख और राजनीतिक कद बड़ा रहा है। वर्ष 1956 में फरेंदा में जन्मे अमरमणि त्रिपाठी चार बार विधायक और दो बार यूपी सरकार में मंत्री रह चुके हैं। अपराध की दुनिया से राजनीति तक का सफर भी मुश्किलों भरा रहा है। कभी बाहुबली वीरेंद्र प्रताप सिंह के सामने चुनावी ताल ठोंक उनसे मुकाबला तो कभी अपने गुरु पंडित हरिशंकर तिवारी से अदावत के चलते अमरमणि हमेशा सुर्खियों में रहे।

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अमरमणि की राजनीति में एंट्री से पहले ही हत्या, मारपीट, अपहरण जैसे आरोप लग चुके थे। जैसे-जैसे अपराध का ग्राफ बढ़ता गया, अमरमणि के नाम की गूंज लखनऊ तक सुनाई देने लगी। यह वह दौर था, जब पूर्वांचल में ब्राह्मण और राजपूत के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही थी।

ब्राह्मणों का नेतृत्व हरिशंकर तिवारी कर रहे थे। वहीं, ठाकुरों के बीच वीरेंद्र प्रताप शाही अपनी पकड़ बनाए हुए थे। गोरखपुर में छात्र राजनीति चरम पर थी। ऐसे में दोनों गुट लगातार आमने-सामने आ रहे थे। ऐसे ही दौर में अमरमणि त्रिपाठी ने सियासत में प्रवेश किया।

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1980 में पहली बार वीरेंद्र शाही के खिलाफ ठोंकी थी ताल

अमरमणि त्रिपाठी ने पहला चुनाव 1980 में वीरेंद्र शाही के खिलाफ लक्ष्मीपुर सीट से लड़ा और हार गए। 1985 में एक बार फिर लक्ष्मीपुर से चुनावी मैदान में उतरे। इस बार भी हार मिली। 1989 में तीसरी बार की कोशिश में विधायक चुने गए। इसके बाद अमरमणि ने अपनी सियासी जमीन तैयार ली। फिर 1996, 2002 और 2007 में विधायक बने। 2007 में मधुमणि हत्याकांड में उम्रकैद की सजा सुनाई गई, इसके बाद चुनाव नहीं लड़ सके।

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