पूर्व मंत्री के सियासत में आने के बड़े मायने हैं। एक तो पिछले कुछ साल से भाजपा से उनकी और बेटे की नजदीकियां भी रही हैं। दूसरे राजनीतिक दलों को भी पता है कि उनके गृह जनपद महराजगंज के अलावा सिद्धार्थनगर और संतकबीरनगर में उनकी सीधी पकड़ है। ऐसे में पर्दे के पीछे से ब्राह्मण चेहरे के तौर पर अमरमणि को लाया जा सकता है।
हालांकि अमरमणि की रिहाई और उसकी आगे की सियासत पर किसी दल ने कोई प्रतिक्रिया अभी तक नहीं दी है। सामाजिक चिंतक और राजनीतिक विशेषज्ञ भी खुलकर बोलने से परहेज कर रहे हैं। लेकिन अंदरखाने की चर्चा है कि अमरमणि के बाहर आने के बाद कई राजनीतिक दलों के सियासी समीकरण बदल सकते हैं।
इसे भी पढ़ें: महिला के व्हाट्सएप पर अश्लील संदेश, वीडियो भेजकर बोला-मुझसे शादी करोगी
पूर्वांचल की राजनीति में अमरमणि त्रिपाठी का रसूख और राजनीतिक कद बड़ा रहा है। वर्ष 1956 में फरेंदा में जन्मे अमरमणि त्रिपाठी चार बार विधायक और दो बार यूपी सरकार में मंत्री रह चुके हैं। अपराध की दुनिया से राजनीति तक का सफर भी मुश्किलों भरा रहा है। कभी बाहुबली वीरेंद्र प्रताप सिंह के सामने चुनावी ताल ठोंक उनसे मुकाबला तो कभी अपने गुरु पंडित हरिशंकर तिवारी से अदावत के चलते अमरमणि हमेशा सुर्खियों में रहे।
इसे भी पढ़ें: 18 साल बाद जेल से रिहा हुए अमरमणि और उनकी पत्नी, कवियत्री मधुमिता हत्याकांड में हुई थी सजा
अमरमणि की राजनीति में एंट्री से पहले ही हत्या, मारपीट, अपहरण जैसे आरोप लग चुके थे। जैसे-जैसे अपराध का ग्राफ बढ़ता गया, अमरमणि के नाम की गूंज लखनऊ तक सुनाई देने लगी। यह वह दौर था, जब पूर्वांचल में ब्राह्मण और राजपूत के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही थी।
ब्राह्मणों का नेतृत्व हरिशंकर तिवारी कर रहे थे। वहीं, ठाकुरों के बीच वीरेंद्र प्रताप शाही अपनी पकड़ बनाए हुए थे। गोरखपुर में छात्र राजनीति चरम पर थी। ऐसे में दोनों गुट लगातार आमने-सामने आ रहे थे। ऐसे ही दौर में अमरमणि त्रिपाठी ने सियासत में प्रवेश किया।
इसे भी पढ़ें: हर हाल में साली को पाने की चाहत: शादी को राजी न हुई लड़की तो जीजा ने की नीच हरकत, मुंह छिपाने को मजबूर पीड़िता
अमरमणि त्रिपाठी ने पहला चुनाव 1980 में वीरेंद्र शाही के खिलाफ लक्ष्मीपुर सीट से लड़ा और हार गए। 1985 में एक बार फिर लक्ष्मीपुर से चुनावी मैदान में उतरे। इस बार भी हार मिली। 1989 में तीसरी बार की कोशिश में विधायक चुने गए। इसके बाद अमरमणि ने अपनी सियासी जमीन तैयार ली। फिर 1996, 2002 और 2007 में विधायक बने। 2007 में मधुमणि हत्याकांड में उम्रकैद की सजा सुनाई गई, इसके बाद चुनाव नहीं लड़ सके।