बीआरडी मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ भूपेंद्र शर्मा ने बताया कि निमोनिया का असर बच्चों पर अब हर मौसम में पड़ा रहा है। पहले आम तौर पर ठंड में ही निमोनिया के मामले आते थे। हर मौसम में मरीज मिलना चिंता का विषय है। आरएमआरसी की टीम ने कुछ बच्चों के नमूने लिए हैं, जिसके जरिए यह पता करने की कोशिश की जा रही है कि मौसम के साथ कहीं वायरस का स्वरूप तो नहीं बदला है, जो अलग-अलग मौसमों में अपना असर दिखा रहा है।
डॉ. हीरावती देवल ने बताया कि शोध के जरिए यह देखा जा रहा है कि बच्चों में निमोनिया के कारण क्या हैं? निमोनिया का टीका लगने के बाद बच्चों के अंदर प्रतिरोधक क्षमता का असर कितना है? क्योंकि, कई बच्चे ऐसे भी हैं, जिन्हें निमोनिया का टीका लगा है, लेकिन वह भी इसका शिकार हुए हैं। इसके अलावा बच्चों के शरीर पर कौन सा निमोनिया ज्यादा प्रभावी साबित हो रहा है।
डॉ हीरावती देवल ने बताया कि निमोनिया वायरस, बैक्टीरिया, फफूंदी व परजीवी के कारण होने वाला रोग है। ये सब श्वांस के जरिए फेफड़ों में पहुंचकर संक्रमण करते हैं। स्ट्रेप्टोकोकस नामक बैक्टीरिया के कारण यह सबसे अधिक फैलता है, जो बच्चों में सबसे अधिक होता है। यह अधिकांश फ्लू (बुखार) के बाद होता है।
बच्चों में हो रहा यह निमोनिया
डॉ भूपेंद्र शर्मा ने बताया कि निमोनिया पांच तरह का होता है। बीआरडी में सभी पांचों तरह के निमोनिया के मरीज मिल भी रहे हैं। इनमें बैक्टीरियल, वायरल, माइक्रोप्लाज्मा, एस्पिरेशन, फंगल निमोनिया शामिल हैं। जबकि, पहले केवल बैक्टीरिया और वायरल निमोनिया ही मरीज मिलते थे। बताया कि बच्चों को निमोनिया टीबी, रूबैला, खसरा और वायरल डिजीज से भी हो सकता है। जबकि, इनके टीके भी बच्चों को लगाए जा रहे हैं। ऐसे में शोध बेहद जरूरी है।
शोध के बाद इलाज के तरीके में हो सकता है बदलाव
डॉ. हीरावती देवल ने बताया शोध के बाद यह पता चल जाएगा कि आखिरकार कौन से निमोनिया का वायरस ज्यादा हानिकारक है और कौन सा कम। इसके बाद उसी तर्ज पर बच्चों का इलाज किया जाएगा। इससे इलाज के तरीके में बदलाव हो सकेगा, जो पूर्वांचल के बच्चों के लिए ज्यादा कारगर साबित होगा।