कालांतर में यह महल खंडहर में तब्दील हो गया। पहले तो महल के खंडहर पर ही देवी की पिंडी की पूजा की जाती थी लेकिन बाद में मझौलीराज परिवार के धर्मेर में रहने वाले वंशजों ने वहां मंदिर का निर्माण कराया। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से जो भी मांगा जाए वह कभी खाली नहीं जाता।
मंदिर के चारों तरफ विशाल तालाब होने के कारण पूरे साल इसमें पानी भरा रहता है। 15 वर्ष पूर्व तक देवी दर्शन को आने वाले श्रद्धालुओं को तैरकर मंदिर तक जाना पड़ता था। बाद में यहां पोखरे के बीच से सड़क का निर्माण करा दिया गया है। तालाब के बीच में होने के कारण यह मंदिर अपनी अद्वितीय मनमोहक दृश्य के कारण भी श्रद्धालुओं में आकर्षण का केंद्र है।