डबल डिस्टेंट सिग्नल स्टेशन यार्ड के बाहर लगे डिस्टेंस सिग्नल से पहले लगा होगा। इसमें सिर्फ लाल और पीली बत्ती होगी। यह सिग्नल लोको पायलट को ट्रेन की रफ्तार नियंत्रित करने के लिए अलर्ट करेगा। हरी लाइट का मतलब होगा ट्रेन उसी गति से स्टेशन पर जा सकती है। पीली लाइट का मतलब होगा, लोको पायलट ट्रेन की रफ्तार को नियंत्रित कर ले। रेलवे के अनुसार इससे ट्रेनों के बिना वजह आउटर पर खड़े रहने की समस्या से छुटकारा मिलेगा।
बढ़ाई जा रही है पटरियों की क्षमता
पूर्वोत्तर रेलवे के रूट पर ट्रेनों की रफ्तार 110-160 किमी प्रति घंटे तक होगी। इन ट्रेनों के संचालन के लिए बाराबंकी से छपरा (425 किमी) तक पटरियों की क्षमता बढ़ाने का काम चल रहा है। मौजूदा पटरियों और उसके स्लीपर को बदला जा रहा है। अभी जो पटरियां लगी हैं उनका वजन 52 किलो प्रति मीटर होता है।
इसकी जगह 60 किलो प्रति मीटर वजन की पटरियां बिछाईं जा रही हैं। कोविड संक्रमण काल में जब ट्रेनें नहीं चल रही थीं तो यह काम तेजी से किया गया। नई पटरियों के वजन सहने की क्षमता ज्यादा होगी। इनमें फ्रैक्चर की आशंका न के बराबर होगी। पटरियों के नीचे से पत्थर हट जाएं या गैप हो जाने पर भी पटरियां टेढ़ी नहीं होंगी। पटरियों के बीच के गैप को खत्म करने के लिए इनकी लंबाई बढ़ाई जा रही है।
सीपीआरओ पंकज कुमार सिंह ने कहा कि छपरा से बाराबंकी तक डबल डिस्टेंट सिग्नल लगाने के लिए बजट पहले से मंजूर है। कार्यदायी एजेंसियां तय कर दी गई हैं। संरक्षा की दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा। ट्रेनों की गति बढ़ जाएगी, जिससे समय पालन में सुधार होगा।