बर्थ एसफिक्सिया से नवजातों की जिंदगी खतरे में पड़ जा रही है। निजी अस्पतालों और ग्रामीण क्षेत्रों से प्रतिदिन 4-5 नवजात बीआरडी मेडिकल कॉलेज के नियोनेटल इनसेंटिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में भर्ती किए जा रहे हैं। इस बीमारी से पीड़ित 30 से 40 प्रतिशत नवजात ही बच पाते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर बच्चा इस बीमारी से बच भी जाता है तो उसके मस्तिष्क और अंग स्थाई रूप से खराब हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में सलाह है कि अगर नवजात का जन्म हो रहा है और वह रो नहीं रहा है तो तत्काल उसे बाल रोग विशेषज्ञ के पास ले जाएं।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. भूपेंद्र शर्मा ने बताया कि जन्म लेने के तुरंत बाद शिशु अगर नहीं रोते हैं तो उस बच्चे को उल्टा करके शरीर के निचले हिस्सों व कमर पर हल्के हाथों से थपथपाया जाता हैं जिससे कि बच्चा रोए। अगर बच्चा नहीं रोता है तो उसे ही बर्थ एसफिक्सिया कहा जाता है। इस स्थिति में बच्चे के मस्तिष्क तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती है। इससे नवजात की जान चली जाती है। बताया कि बीआरडी में हर माह 40 से 50 नवजात बर्थ एसफिक्सिया के पहुंच रहे हैं। इनमें 30 से 40 प्रतिशत नवजात ही बच पाते हैं।
इसकी वजह यह है कि ग्रामीण और निजी अस्पतालों में जो प्रसव हो रहे हैं, वहां पर बाल रोग विशेषज्ञों की मौजूदगी नहीं रहती है। अगर बाल रोग विशेषज्ञ मौके पर रहें तो तत्काल स्थितियां नियंत्रण में आ सकती हैं।
क्या है बर्थ एसफिक्सिया
डॉ भूपेंद्र शर्मा ने बताया कि बर्थ एसफिक्सिया को पेरीनेटेल एसफिक्सिया और न्यूनेटेल एसफिक्सिया भी कहा जाता है। यह बच्चे को जन्म के तुरंत बाद होता है। जब ऑक्सीजन बच्चे के मस्तिष्क तक नहीं पहुंच पाता और बच्चे को सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। ऑक्सीजन न लेने के कारण बच्चे के शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। शरीर में एसिड का स्तर बढ़ जाता है। यह जानलेवा हो जाता है। इसलिए तुरंत इलाज की आवश्यकता होती है।
बर्थ एसफिक्सिया के लक्षण
त्वचा का रंग बदल जाना। प्रसव के तत्काल बाद शिशु का एकदम शांत होना या न रोना। हृदय की गति कम होना। सांस लेने में कठिनाई। बच्चे का सुस्त होना जैसे इसके लक्षण है। ऐसी स्थिति में अगर बच्चा है तो तत्काल बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क कर उसका इलाज कराएं।
शहर के दो सेंटरों में भी बच्चे होते हैं भर्ती
शहर के दो हायर सेंटर ऐसे हैं जहां पर बर्थ एसफिक्सिया के लक्षण वाले नवजात भर्ती होते हैं। इन सेंटरों पर भी करीब हर दिन तीन-चार नवजात इलाज के लिए आते हैं।