ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, पुत्र की दीर्घायु के लिए हलषष्ठी व्रत किया जाता है। इस दिन बलराम जयंती भी मनाई जाती है। इसे तिनछठी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत माताएं संतान की लंबी आयु के लिए रखती हैं। व्रत के दौरान कोई अन्न नहीं ग्रहण करती हैं। हलषष्ठी व्रत में हल से जुती हुई भूमि के अनाज और सब्जियों का प्रयोग वर्जित है।
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बताया कि इस व्रत में वही वस्तुएं ग्रहण की जाती हैं जो तालाब या सरोवर में पैदा होती हैं या बिना जुती हुई भूमि में पाई जाती हैं। इनमें तिन्नी का चावल, कर्मुआ का साग आदि शामिल हैं। इस दिन गाय के किसी उत्पाद का प्रयोग नहीं होता है। भैंस का दूध, दही, घी का प्रयोग किया जाता है।
पूजा की विधि
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार, इस दिन घर के बाहर भैंस के गोबर से षष्ठी माता का चित्र बनाएं। उसके पश्चात गणेश-गौरी और बलराम की पूजा करें। एक छोटा सा गड्ढा बनाकर उसमें झरबेरी, पलाश और कुश का पेड़ लगाएं और वहीं बैठकर पूजा-अर्चना करें। व्रती हलषष्ठी व्रत की कथा सुनें।