जिन 15 निजी अस्पतालों को लेकर आईएमए ने चिंता जाहिर की थी, उनमें से कुछ ऐसे हैं, जहां वेंटिलेटर और आईसीयू के एक या फिर दो बेड हैं। यह बेड भी पुराने अस्पतालों से खरीदे गए हैं। इसकी पड़ताल तक स्वास्थ्य विभाग की टीम ने नहीं की है। इसकी वजह से इनका हौसला इस कदर बढ़ गया कि यह मरीजों से मनमाने शुल्क वसूलते गए।
कुछ अस्पताल संचालकों की मनमानी से ही अच्छे डॉक्टर व उनके अस्पतालों के खिलाफ भी सवाल उठाए जाने लगे। इससे चिकित्सक दुखी दिखे। इसी का नतीजा रहा कि आईएमए को आगे आना पड़ा है। आईएमए के पदाधिकारियों का कहना है कि जिन अस्पतालों को इलाज की अनुमति दी गई, उन्हें चिकित्सकों का मुख्य संगठन जानता ही नहीं है।
एक बड़े अधिकारी की भूमिका भी सवालों के घेरे में
कोरोना इलाज की अनुमति देने के ‘खेल’ में स्वास्थ्य विभाग के एक बड़े अधिकारी की भूमिका सवालों के घेरे में है। कहा जा रहा है कि अधिकारी ने जिसे चाहा, उसी को कोरोना इलाज की अनुमति मिल गई। यह भी देखने की जरूरत नहीं महसूस की गई कि अस्पताल में क्या व्यवस्था है। सुविधा-संसाधन हैं या नहीं।
ऑक्सीजन की कालाबाजारी में भी आया नाम
जिन अस्पतालों को इलाज की अनुमति देने पर आईएमए ने सवाल उठाए हैं, उनमें से कुछ का नाम ऑक्सीजन की कालाबाजारी में भी आया है। कहा जा रहा है कि इन अस्पतालों ने इलाज के नाम पर ऑक्सीजन प्राप्त किया लेकिन महंगे दर पर बेच दिया। कुछ अस्पतालों ने मरीजों के तीमारदारों को ही ऑक्सीजन भरवाने में लगा दिया। एक अस्पताल संचालक ऐसे हैं, जो कोरोना संक्रमण से मृत मरीज के परिजनों से दो ऑक्सीजन सिलिंडर भरवाया। इसका इस्तेमाल दूसरे मरीज के लिए कर लिया। अभी तक मृत के परिजनों को सिलिंडर तक वापस नहीं किया है।
जिन अस्पतालों को कोरोना इलाज की अनुमति दी गई, उन्हें चलाने की जिम्मेदारी बिचौलिया या फिर एंबुलेंस चालक उठाते हैं। इसके एवज में मोटा कमीशन लिया जाता है। अस्पताल संचालक मरीज या परिजनों से मनमाना शुल्क वसूलते हैं, फिर एक मरीज को भर्ती कराने वाले बिचौलिया व एंबुलेंस चालक को 20 से 25 हजार रुपये बतौर कमीशन देते हैं।
कुछ निजी अस्पतालों में जेब खाली
इन निजी अस्पतालों ने मरीजों और उनके तीमारदारों की जेब खाली कर दी। थक हारकर तमाम मरीज बीआरडी मेडिकल कॉलेज ले जाए गए। गंभीर हालत में मरीजों को लेकर आए तीमारदार फूट-फूटकर रोए भी। मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों से कहा कि पांच लाख रुपये खर्च हो गए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मरीज की हालत और खराब हो गई है। अब फूटी कौड़ी नहीं बची है। बाहर से एक दवा खरीदने की स्थिति में नहीं हैं।
सीएमओ डॉ. सुधाकर पांडेय ने कहा कि जिन अस्पतालों के खिलाफ शिकायत मिली है, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई है। आईएमए की तरफ से अभी ऐसे अस्पतालों की कोई लिस्ट नहीं दी गई है। यह जरूरी नहीं है कि सभी अस्पताल आईएमए से जुड़े हुए हो। विभाग मानकों को ध्यान में रखकर इलाज की अनुमति देती है, जो अस्पताल मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं, उन्हें अनुमति नहीं दी जाती है।